सिंहासन बत्तीसी : तेईसवीं पुतली धर्मवती की कहानी

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कुछ दिन स्वतंत्र रूप से रहने पर वह छोटे-छोटे जानवरों को मारकर खाने लगा। लेकिन गड़रिए के कहने पर पिंजरे में शान्तिपूर्वक बन्द हो जाता। कुछ दिनों बाद उसका बकरियों की तरह भीरु स्वभाव जाता रहा।

एक दिन जब फिर से उसी शेर को उसके सामने लाया गया तो वह डरकर नहीं भागा। शेर की दहाड़ उसने सुनी तो वह भी पूरे स्वर से दहाड़ा। राजा अपने दरबारियों के साथ सब कुछ गौर से देख रहे थे। उन्होंने दरबारियों को कहा कि इन्सान में मूल प्रवृतियां शेर के बच्चे की तरह ही जन्म से होती हैं।

अवसर पाकर वे प्रवृतियां स्वत: उजागर हो जाती हैं जैसे कि इस शावक के साथ हुआ। बकरियों के साथ रहते हुए उसकी सिंह वाली प्रवृत्ति छिप गई थी, मगर स्वतंत्र रूप से विचरण करने पर अपने-आप प्रकट हो गई। उसे यह सब किसी ने नहीं सिखाया, लेकिन मनुष्य का सम्मान कर्म के अनुसार किया जाना चाहिए।



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