सिंहासन बत्तीसी : सत्‍ताइसवीं पुतली मलयवती की कहानी

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विक्रम राजा बली से विदा लेकर प्रसन्नचित्त होकर मृत्युलोक की ओर लौट चले। पाताललोक के प्रवेश द्वार के बाहर फिर वही अनन्त गहराई वाला समुद्र बह रहा था।

उन्होंने भगवान विष्णु का दिया हुआ शंख फूंका तो समुद्र फिर से दो भागों में बंट गया और उसके बीचोंबीच वही भूमि वाला मार्ग प्रकट हो गया। उस भूमि मार्ग पर चलकर वे समुद्र तट तक पहुंच गए। वह मार्ग गायब हो गया तथा समुद्र फिर पूर्ववत होकर बहने लगा।

वे अपने राज्य की ओर चल पड़े। रास्ते में उन्हें एक स्‍त्री विलाप करती मिली। उसके बाल बिखरे हुए थे और चेहरे पर गहरे विषाद के भाव थे। पास आने पर पता चला कि उसके पति की मृत्यु हो गई है और अब वह बिलकुल बेसहारा है।
विक्रम का दिल उसके दुख को देखकर पसीज गया तथा उन्होंने उसे सांत्वना दी। बली वाले मूंगे से उसके लिए जीवन दान मांगा। उनका बोलना था कि उस विधवा का मृत पति ऐसे उठकर बैठ गया, मानो गहरी नींद से जागा हो। स्‍त्री के आनन्द की सीमा नहीं रही

(समाप्त)



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