जानिए, परम सिद्ध नौ नाथों को

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भर्तृहरि नाथ : भर्तृहरि राजा विक्रमादित्य के बड़े भाई थे। राजा गंधर्वसेन ने राजपाट भर्तृहरि को सौंप दिया। अपनी रानी, जिससे भर्तृहरि अपार प्रेम करते थे, से मिले धोखे और फिर पश्चाताप के रूप में रानी द्वारा आत्मदाह की घटना ने भर्तृहरि को वैराग्य जीवन की राह दिखा दी। वे वैरागी हो गए। इसके बाद विक्रमादित्य को राज्यभार संभालना पड़ा।

एक सिद्ध योगी ने राजा भर्तृहरि को एक फल दिया और कहा कि इसको खाने के बाद आप चिरकाल तक युवा बने रहेंगे। भर्तृहरि ने फल ले लिया पर उनकी आसक्ति अपनी छोटी रानी में थी। वह फल उन्होंने हिदायत के साथ उन्होंने अपनी छोटी रानी को दे दिया। छोटी रानी को एक युवक से प्रेम था, तो उसने वह फल युवक को दे दिया। युवक को एक वैश्या से प्रेम था, तो उसन उसे वह फल दे दिया वैश्या को लगा कि वह तो पतिता है; फल के लिए सुपात्र तो राजा भर्तृहरी हैं जो दीर्घायु होंगे तो राज्य का कल्याण होगा। ऐसा सोचकर उस वैश्या ने वह फल वेश बदल कर राजा को दिया। फल को देख राजा के मन से आसक्ति जाती रही और उन्होंने नाथ संप्रदाय के गुरु गोरक्षनाथ का शिष्यत्व ले लिया।
मध्यप्रदेश के उज्जैन में आज भी भर्तृहरि की गुफा है जहां वे तपस्या किया करते थे।

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