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Written By WD

इस्लाम में बहुविवाह जायज नहीं

इस्लाम धर्म
शराफत खा

इस्लाम धर्म के बारे में लोगों को यह गलतफहमी है कि यह बहुविवाह का समर्थक है। खुद इस्लाम के मानने वाले और मुसलमान कहलाने वाले लोग भी अपने जहन में ये गलतफहमी पाले हुए हैं कि इस्लाम एक से ज्यादा विवाह की इजाजत देता है। पवित्र ग्रंथ कुरआन की रोशनी में देखें तो हम जान सकेंगे कि असलियत क्या है और सचमुच हम अब तक भटकाव में रहे।

जब इस्लाम धर्म का उदय हुआ तब के युग में बहुविवाह प्रथा अपने चरम पर थी। कई लोगों की 100 या उससे ज्यादा पत्नियाँ थीं। यानी अगर कोई एक दो या तीन...दस से अधिक पत्नियाँ भी रख रहा है तो उसे बुरा नहीं माना जाता था। इस्लाम ने इस प्रथा का विरोध किया और विवाह की संख्याओं की ऊपरी हद तय की।

इस्लाम ने बताया कि एक व्यक्ति चार से अधिक पत्नियाँ नहीं रख सकता। चार पत्नियाँ भी विशेष परिस्थिति में रखी जाएँ। इस्लाम अपने इस फरमान में बहुविवाह का समर्थक नहीं है, बल्कि वह विशेष परिस्थितियों में एक से अधिक विवाह करने की अनुमति प्रदान करता है।

कुरआन सूर-ए-निसा में कहता है 'और सिर्फ एक से शादी की जाए' (मफूम)। कुरआन बहुविवाह के बजाय एक शादी का फरमान दे रहा है, लेकिन हमने उसके इस संदेश को सुना ही नहीं तो अमल क्या करेंगे।

कुरआन की सूर-निसा में कहा गया है- अपनी पसंद की लड़की से शादी करो, शादी एक, दो, तीन या चार करो (विशेष परिस्थितियों में), लेकिन अगर कहीं ये गुमान है कि तुम अपनी एक से ज्यादा बीवियों को समान अधिकार नहीं दे पाओगे तो बेहतर है कि एक शादी करो। (मफूम)।

कुरआन ने इसी सूरह में कहा गया है- और तुम कभी अपनी एक से ज्यादा बीवियों को समान अधिकार नहीं दे पाओगे। (मफूम)। इससे साफ है कि कुरआन कहता है कि एक शादी करो।

कुरआन की रोशनी में अब ये साफ हो गया है कि इस्लाम बहुप्रथा का हिमायती नहीं है बल्कि वह विशेष परिस्थितियों की बात करता है। ये हमारा अंधकार कोई अज्ञान है जो हम कहते हैं कि इस्लाम में एक से ज्यादा विवाह को सही माना गया है। बेशक इस्लाम में एक से ज्यादा विवाह करने पर पाबंदी नहीं लगाई है, लेकिन यह व्यवस्था भी परिस्थिति को देखते हुए दी गई है। सिर्फ अपने 'तनसुख' के लिए इस्लाम का हवाला देकर एक से ज्यादा शादी करना जायज नहीं है।
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