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Written By WD

मुंबई का ग्रुप फोटो

स्वर्गीय दिलीप चित्रे की मर्मस्पर्शी कविता

स्वर्गीय दिलीप चित्रे
करीब तीस वर्ष पूर्व लिखी प्रसिद्ध मराठी कवि स्वर्गीय दिलीप चित्रे की यह कविता, इस बात का अंतर्साक्ष्य देती है कि बाल ठाकरे-राज ठाकरे-उद्धव ठाकरे के दावे के बावजूद मुंबई दरअसल किसकी है :

दीमक लगे चेहरे
कंदील की रोशनी में
निचाट दीवारें, स्याह फर्श
थाली, कटोरियाँ लोटे, पीतल के गिलास
परोसते हाथ की परछाईं
दीवार के बीचोंबीच परदादा का साया
दाहिने हाथ से कौर मुँह को ले जाते
थाली में क्षीण टिमटिमाहट में भी
सफेद भात सफेद छाछ, हरी भाजी
चुप्पी में खाने की मच्‌मच्‌ आवाज
खानदान का छप्पर उड़ता रहा बार-बार
मिलों चार दीवारें जिन पर जा बसा
कोंकण से गुजरात, बंबई से बड़ोसा
बड़ोदे से फिर बंबई
ट्राम की शुरूआत से उसकी पटरियों के उखड़ने तक
और सीपिया रंगवाले फोटो में उन्नीस सौ बीसवाले वे लोग
मरे हुए, कोट-टोपी पहिने, हाथ में छड़ी थामे
पंप शू या जूती डटाए जेब घड़ीवाले
मरने के बाद भी अभी तक टकटकी बाँधे देखते सीधे
कैमरे की आँख में 'हिलो मत' कहे मुताबिक
दादी बताती थी 'मैजेस्टिक सिनेमा लक्ष्मी चाल'
सच, आज भी मौजूद है गिरगाँव में वह ठिकाना
जहाँ दादा में कमाए लाखों, रुतबा जमाया
ऐन बीच की उम्र में मर गए फाटक्‌ से कुछ कहते है टोना
विक्टोरिया बग्घी में घूमना, पारसी-गुजरातियों में उठना-बैठना
सटोरिया और जुआरियों के बीच आना-जाना
कोई बताता है एक रखैल भी थी बाकायदा
सारे खानदान पे छाया हुआ ठस्सा क्या मजाल किसी की
इन्होंने भास्कर बुवा, अल्लादिया, रहमत खाँ सुने थे
या नहीं, क्या पता, पर गंधर्व के नाटक देखे थे
जरूर और महालक्ष्मी की रेस
या तो फोर्ट में आकर केक खाए होंगे
ग्रेंड रोड पर भूले-भटके गाना-बजाना-नाच-श्रृंगार
घाटी कोंकणियों की, फारसी गुजरातियों की
खोजा बोहरों की, पाठार दवणों को
पाचकलसियों सोनकलसियों कोलियों की
और भंडारियों, ईस्ट इंडियनों और
बेने इजराइलियों की बंबई में रहे-बसे
ऊपर के साहब सबके सब गोरे, गवर्नर, कमिश्नर,
चीफ-जस्टिस, सेके्रटरी, जनरल और दूसरे भी
नीचे हम तुम गोगटे, आपटे, कीर्तिकर, या धुरू
बुरहानुद्दिन अथवा बाम्बोट, शाह, पटेल, गाँधी
डिक्रूज या डिमेलो नागावकर या कोली
अबूबकर प्रधान मोतीवाला कैकिणी जयकर
और और भी नीचे टोकनियाँ ही टोकनियाँ बोरे और छबड़ियाँ
पीला हाउस, पिकेट रोड मारुती, खड़ा पारसी
गोल बिल्डिंग और इसी तरह के तमाम पते
तिलक पुतले के पहलेवाली खुली चौपाटी
नारियल के पेड़, बगीचियाँ घने वृक्ष
विलायती बोटें गोदी के पिटारे, माल से पटे गोदाम
अभी हमारी त्वचा में छिपी हुई बंबई की पसलियाँ
पसलियों के भीतर का इतिहास बंधता-उभरता शहर
जिसमें इन्होंने साहस किया या की नौकरियाँ
इनकी नौवारी साड़ियों से दीवारों से बाहर न निकलनेवाली
नियमपूर्वक जच्चा बननेवाली रबने-खटनेवाली बीबियाँ
इनकी शादी लायक बहनें या बेटियाँ त्योहार और कर्जे
इनकी मूछें और दैनंदिनियाँ पगड़ी के नीचे हिसाब
ये तकदीर आजमाने आए हुए अंग्रेजी रटनेवाले
नए हुनर सीखने वाले विज्ञापन से चुँधियाएँ
या संस्कृत के दुशाले में छिपनेवाले घबराए
एक बन गया मास्टर एक धंधे में लग गया
एक इंजीनियर बन रेलवे में लगा
एक बी.ए. में प्रथम श्रेणी होकर मर गया
ये प्लेग, इंफ्लुएंजा टाइफाइड, कालरा से मरनेवाले लोग
टी.वी. और मलेरिया से छीजते गए लोग
माधव बाग, भलेश्वर, मुंबा देवी, कालबा देवी, ठाकुर द्वार
गिरगाँव की बगीचियों से बालकेश्वर तक घूमनेवाले
गोलपीठा, ग्रेंड रोड, भायखला,
माझगाँव डोंगरी तक भी जानेवाले लोग,
जीआईपी और बीबीसीआई से
दूर तक जानेवाले हथेली की तरह खुली हुई बंबई की
अँगुलियों पर बसे हुए लोग
इनके गिचपिच चरित्रों की सुघड़ बनाए कुंडली
तो भी किसी की गरदन पर शनि सवार किसी पर
मंगल का धुपा छुरा किसी की गरदन
राहु केतु ने दबोची
इनकी जन्म रेखाएँ गुजरी घाटों पर से जाती रेल की तरह
इनकी धन रेखाओं के पुल बह गए बाढ़ में
इनकी हृदय रेखाएँ तड़क गई अकाल की धरती सी
यह अदृश्य और बहादुर पूर्वज जिन्होंने
शिवाजी के जमाने में खिताब और सनदें कमाईं
बाद में हाथी के पाँवों तले कुचले गए या भाग गए कोंकण की दिशा में
बिना गरदन उठाए चुपचाप खेती पर बसर करते रहे
ये एक वीरा और खंडोबा को बकरे की बलि चढ़ानेवाले
यूँ दशहरे तक तलवार को म्यान में रख
अक्षरों के मोड़ सुधारने वाले फारसी तक सीखनेवाले लोग
ये कहाँ से आए मैं नहीं जानता
हजारों खूनों की होगी जानी-अनजानी मिलावट
इनकी तो फिर से फोटो उतारी जाय
सर्वपित्री अमावस्या के आकाश जितना फलक
और इतना करके भी फर्क क्या पड़ता है?
कैमरे की आँख में टकटकी बाँधे देखता है यह मरा हुआ ग्रुप
और उन्हें 'स्माईल प्लीज' तक कहने की मुझे मोहलत नहीं।

(अनुवाद : चंद्रकांत देवताले)

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