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प्रभात-कुसुम
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जयशंकर प्रसाद धरे हिय माहिं असीम अनन्द।सने शुचि सौरभ सों मकरंद॥समीरन में सुखमा भरि देत।प्रभातिक फूल हियो हरि लेत॥मनो रमनी निज पीय प्रवास।फिरी लखि कै निज बैठि निवास॥निरेखत अश्रु-भरे निज नैन।अहो इमि राजत फूल सचैन॥कहो तुम कौन लख्यो शुभ-रूप।गहौ इतनी प्रतिमा सुअनूप॥पड़यो तुम पै कहु कौन प्रकाश।इतो तुम माहिं लखात विकास॥दिवाकर को कर संगम पाइ।अहो तुम फूल फिरो इतराइ॥अरे नहिं जानत फूल अजान।यहै करिहै तब मर्दन मान॥