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उम्र इस तरह बीत रही
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सुरेंद्र कुमार 'सुमन'उम्र इस तरह बीत रही क्षण क्षण पल पलशांत वन में बह रहा झरना जैसे कल कलजल बढ़ता आगे निरंतर हठीपत्थरों को काटता चलाजीव वनस्पति को दे जीवनधरा की चुनरी को रंगता रचता।चूमकर नभ के माथे को गिर रहागोद में धरा की छल छलउम्र इस तरह बीत रही क्षण क्षण पल पल।हरी लताएँ फैली जीवन की चारों ओरलिपटी आशा के वृक्ष से होकर भाव-विभोरसरसराती पवन के झौंके छेड़े मन की तारेंवर्षा की बूँदे पत्तों पर बीते क्षण पुकारें।ऊँचे वृक्षों की शाखों पर फैल रहापंछियों का मधुर कोलाहलउम्र इस तरह बीत रही क्षण क्षण पल पल।रूई से दिखते आवारा बादलइतराते पर्वत से टकरातेऊँघते कभी गोद में उनकीकभी गरजकर वर्षा को बरसाते।टहनियों से छँटकर धूप फैलीयहाँ वहाँ जैसे घासों पर मखमलउम्र इस तरह बीत रही क्षण क्षण पल पल।