आधार कार्ड यानी धोखे का आधार

- सचिन कुमार जैन

आधार यानी विशेष पहचान के आधार को समझिए। लोगों को पहचान देने के नाम शुरू हुआ प्रयास महज 3 साल में ही लोगों के लिए विकास से बहिष्कार और योजनाओं से बेदखली का कारण बनने लगा। इसका मकसद सरकार के गरीबों पर किए जाने वाले खर्च को कम करना बन गया है और दूसरा मकसद है समुदाय को नकद धन देना ताकि वे बाज़ार को फायदे रोशन करें।
और फिर 1 जनवरी 2013 से आधार आधारित नकद हस्तांतरण योजना की शुरुआत कर दी। यह 4 लाख वो लोग हैं, जो गरीब हैं पर जिन्हें गरीबी की रेखा में शामिल नहीं किया गया; क्यों; इसका कोई जवाब नहीं है। वित्त मंत्री पी चिदंबरम नकद हस्तांतरण को योजना के बारे में कहते हों -'जादुई से कम नहीं' सरकार मानती है कि हम इससे भ्रष्टाचार कम करेंगे, पर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक पर संसद की स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में कह दिया है कि जब तक बैंकों का ढांचा खड़ा न हो तब तक नकद के बारे में ना सोचें। विशेष पहचान प्राधिकरण भी स्थायी समिति के सामने गया और सुझाव दिया कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून के लाभों को आधार से जोड़ा जाए, पर इस समिति ने भी इस सुझाव की अनुशंसा नहीं की।


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