श्री सरस्वती चालीसा

WD

मातु सहाय कीन्ह तेहि काला।

बुद्धि विपरीत भई खलहाला॥

तेहि ते मृत्यु भई खल केरी।

पुरवहु मातु मनोरथ मेरी॥

चंड मुण्ड जो थे विख्याता।

क्षण महु संहारे उन माता॥

रक्त बीज से समरथ पापी।

सुरमुनि हृदय धरा सब कांपी॥



सम्बंधित जानकारी


और भी पढ़ें :