नूतन वर्ष शुभ हो
संकल्पों की जीत हो
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उदासीनता न सही पर जो जिज्ञासा और मोह नए के प्रति होता है, पुराने के साथ नहीं रह पाता। बीता वर्ष चाहे कितनी ही खूबसूरत सौगातें सौंप जाए, लेकिन लोभी मन कभी संतुष्ट नहीं होता। आने वाले वर्ष के लिए कहीं अधिक खूबसूरती के सपने अनजाने ही शहदीया आँखों में सजने लगते हैं।
कितना सुखद लगता है नूतन वर्ष को निहारना, उत्सुकतावश ताकना! ह्रदय में तरंगित होता है यह भोला प्रश्न- 'क्या लाए हो मेरे लिए?'
और ह्रदय में ही काँपता-कुनमुनाता एक घबराया प्रश्न- 'पता नहीं क्या लाए हों मेरे लिए?' उत्सुकता एक ही है पर स्वरूप भिन्न है। एक उत्साह से भरपूर कि क्या लाए हो मेरे लिए और दूसरा आशंका में डूबा कि पता नहीं.....?
जाते हुए साल ने जो जहरीले दंश दिए हैं उससे सभी आहत हुए हैं। मुंबई की अनहोनी के बाद हर भारतीय मन का आशंका से ग्रस्त होना स्वाभाविक है।
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कौन जाने इस नए वर्ष में आकाँक्षा पूरी हो जाए। नया जॉब मिल जाए। शायद बिटिया दुल्हन बन जाए। एक अदद आशियाना खड़ा हो जाए। बच्चों के परीक्षा परिणाम अपेक्षानुरूप आ जाएँ। कोई हमसफर मिल जाए। प्रमोशन हो जाए। या फिर कोई नन्हा, गुदगुदा 'खिलौना' मुस्करा उठे। कितनी-कितनी तमन्नाएँ, कितने-कितने अरमान! हर दिल की ख्वाहिश कि नए बरस में कोई ऐसी खुशी मिल जाए जिसे बरसों से बस दिल में ही सँजोकर रखा है। कभी व्यक्त नहीं किया है।
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