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मैं नारी हूँ
मैं नारी हूँ मुझे किसी ने न जाना किसी ने न पहचानामैं नारी हूँ मेरा काम है लड़ते जाना। लड़ती हूँ मैं पुराने रीति-रिवाजों से करती हूँ अपने बच्चों को सुरक्षितअंधविश्वासों की आँधी से रहती हूँ हरदम अभावों में पर देती हूँ अभयदान।मैं नारी हूँ ... उलझी रहती हूँ सवालों में जकड़ी रहती हूँ मर्यादा की बेड़ियों में बदनामी का ठिकरा हमेशा फोड़ा जाता है मुझ परमैं हँसते-हँसते हो जाती हूँ कुर्बान। मैं नारी हूँ ... नए रिश्तों की उलझन में उलझी रहती हूँ मैंपर पुराने को निभाकर हरदम चलती हूँ मैंरिश्तों में जीना और मरना काम है मेरा।मैं नारी हूँ ...
लेखक के बारे में
गायत्री शर्मा