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तो घर काट रहा है

शेर अज़ीज़ अंसारी
हरसू मिले बाज़ार में अल्फाज़ के नश्तर,
घर आके जो बैठा हूँ तो घर काट रहा है।

नश्तर = खंजर-चाकू
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