जानिए सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्न

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(5) घटखर्पर

के विषय में भी अद्यावधि अल्प सामग्री उपलब्ध है। इनका यह नाम क्यों पड़ा, यह चिंतन का विषय है। इनके विषय में एक किंवदंती प्रचलित है। कहा जाता है कि के सहवास से ये कवि बन गए थे। इनकी यह प्रतिज्ञा थी कि जो कवि मुझे यमक रचना में पराजित कर देगा, उसके घर घड़े के टुकड़े से पानी भरूंगा।
इनके चरित दो लघुकाव्य उपलब्ध हैं। इनमें से काव्य 22 पद्यों का सुंदर काव्य है, जो संयोग श्रृंगार से ओत-प्रोत है। उसकी शैली, मधुरता, शब्द विन्यास आदि पाठक के हृदय पर वैक्रम युग की छाप छोड़ते हैं। यह काव्य घटखर्पर काव्य के नाम से प्रसिद्ध है। यह दूत-काव्य है। इसमें मेघ के द्वारा संदेश भेजा गया है।

घटखर्पर रचित दूसरा काव्य नीतिसार माना जाता है। इसमें 21 श्लोकों में नीति का सुंदर विवेचन किया गया है। इनके प्रथम काव्य पर अभिनव गुप्त, भरतमल्लिका, शंकर गोवर्धन, कमलाकर, वैद्यनाथ आदि प्रसिद्ध विद्वानों ने टीका ग्रंथ लिखे।





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