जानिए सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्न

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(2) क्षपणक

विक्रम की सभा का द्वितीय रत्न के नाम से कहा गया है। हिन्दू लोग जैन साधुओं के लिए 'क्षपणक' नाम का प्रयोग करते थे। दिगम्बर जैन साधु नग्न क्षपणक कहे जाते थे। मुद्राराक्षस में भी क्षपणक के वेश में गुप्तचरों की स्‍थिति कही गई है। महाक्षपणक और क्षपणक नामक लेख में श्री परशुराम कृष्ण गोड़े ने अनेकार्थध्वनिमंजरी नामक कोश के रचयिता को क्षपणक माना है। इस ग्रंथ का समय 800 से 900 ईस्वी का माना जाता है।








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