Shri Krishna 1 August Episode 91 : शकुनि की चाल में आकर बलराम तय कर देते हैं सुभद्रा का विवाह

अनिरुद्ध जोशी|
निर्माता और निर्देशक के श्रीकृष्णा धारावाहिक के 1 अगस्त के 91वें एपिसोड ( Shree Episode 91 ) में रास्ते में एक जगह रथ रोक देते हैं तो श्रीकृष्‍ण पूछते हैं रथ क्यों रोक दिया पार्थ? तब अर्जुन श्रीके हाथ जोड़कर कहता है जब से मेरे निलकांतमणि इस जगत के पालनहार को देखा है, मेरी आंखें उसी को खोज रही है। अभी मेरा मन पूर्णतप्त नहीं हुआ है, उस छवि को देखना का एक बार और मन है। आपकी छवि में और श्रहरि की छवि में कोई अंतर नहीं है। मेरा मन है कि श्रीहरि की छवि मैं उनकी पूर्ण कलाओं के साथ आपमें देखूं। फिर श्रीकृष्ण अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान करने वही चतुर्भुज रूप के दर्शन कराते हैं।
रामानंद सागर के श्री कृष्णा में जो कहानी नहीं मिलेगी वह स्पेशल पेज पर जाकर पढ़ें...वेबदुनिया श्री कृष्णा


श्रीकृष्ण विराट रूप का दर्शन देकर अर्जुन को तत्व ज्ञान के बारे में बताते हैं। फिर वे बताते हैं कि अभी तुम्हें का युद्ध लड़ना है। तुम्हारे शरीर की यात्रा पूर्ण होने के बाद तुम पुन: मुझमें लीन हो जाओगे। अभी जो तुम दृश्य देख रहे हो वह मेरी माया के कारण तुम्हारे स्मृति पटल से लुप्त हो जाएगा। अब तुम आंखें बंद कर लो अर्जुन और अब तुम आंखें खोलते ही तुम खुद को द्वारिका में पाओगे। अर्जुन आंखें बंद करने के बाद तब खोलता है तो उसे समझ में नहीं आता है कि क्या हुआ था। वह खुद को महल में बैठा हुआ पाता है तभी वह देखता है कि सामने से सुभद्रा दौड़ते हुए उसके पास आ रही है।
वह भी उठकर जाते हैं तो सुभद्रा उनसे लिपटकर कहती है आप यमलोक से लौट आए। फिर कभी ऐसी भीषण प्रतिज्ञा न करना, कभी नहीं। फिर सुभद्रा को ध्यान आता है कि ये मैं क्या कर रही हूं तो वे अर्जुन से दूर होकर शरमा जाने लगती हैं तो अर्जुन पीछे से हाथ पकड़कर कहता है सुभद्रा। अभी-अभी तो तुम आई हो और शीघ्र ही चली जा रही हो।

तब सुभद्रा कहती है कि भाभी और मैं तुमसे मिलने आने वाले थे। अब मैं चलती हूं यदि भाभी को पता चल गया तो बहुत गड़बड़ हो जाएगी। मैं भाभी के साथ फिर आऊंगी। यह सुनकर अर्जुन हाथ छोड़ देता है। सुभद्रा अर्जुन को देखते हुए उल्टे कदमों से जाने ही लगती है तभी वहां रुक्मिणी आ जाती है और पीछे से कंधे पर हाथ रखकर कहती है- हूं...अच्‍छा। यह कहते हुए वह हंसती है और कहती है- हम दोनों एक साथ देवरजी से मिलने आने वाले थे परंतु तुम तो पहले से ही यहां उपस्थित हो। यह सुनकर सुभद्रा और अर्जुन दोनों ही सकपका जाते हैं तभी वहां श्रीकृष्ण आ जाते हैं और कहते हैं- अगर अर्जुन मेरे कक्ष में नहीं आया तो क्या हुआ लो मैं अर्जुन के कक्ष में आ गया।
यह सुनकर रुक्मिणी कहती है- अच्छा हुआ जो आप आ गए। देखिये जी मेरी ननदरानी अर्जुन से चुपके-चुपके मिलने आती है। ऐसा सुनकर अर्जुन सिर नीचे झुका लेता है तब श्रीकृष्ण कृष्ण कहते हैं हूं.. तो इसका दंड सुभद्रा और अर्जुन दोनों को अवश्‍य दो। यह सुनकर रुक्मिणी कहती है दंड, कैसा दंड? तब श्रीकृष्‍ण कहते हैं कि ये दोनों एक-दूसरे से चुपके-चुपके से मिलते हैं ना, इसलिए इन दोनों का विवाह हम धूमधाम से करा देंगे। यह सुनकर शरमाकर सुभद्रा कहती है भैया और अर्जुन कहता है वासुदेव। इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं- तुम हमारे बहनोई बनो इससे प्रिय क्या हो सकता है पार्थ। तब अर्जुन श्रीकृष्ण को गले लगा लेता है।
फिर रुक्मिणी कहती है- तो फिर करा देते हैं इनका विवाह। तब श्रीकृष्ण कहते हैं- हां परंतु दाऊ भैया के आने के पहले इस तरह विवाह कराना मर्यादा का उल्लंघन है रुक्मिणी। दाऊ भैया आ जाए तो उनसे बात करके इन दोनों का विवाह निश्‍चित कर देंगे।

फिर उधर, बलरामजी शकुनि के साथ बैठकर दुर्योधन का गदा युद्ध देखने के बाद कहते हैं वाह दुर्योधन वाह..वाह बहुत अच्‍छे। सचमुच तुम एक महान गदाधर बन गए हो। यह सुनकर शकुनि कहता है- दाऊजी इसका मतलब दुर्योधन की शिक्षा पूर्ण हो गई है? इस पर कहते हैं- अवश्य, अब ये एक महान गदाधर बन गया है। तब शकुनि कहता है- दुर्योधन इसका मतलब यह कि गुरु को गुरु दक्षिणा दो।

फिर दुर्योधन बलराम के विधिवत रूप से चरण धोकर उन्हें प्रणाम करके कहता है- गुरुदेव आपको मैं क्या दे सकता हूं? आप तो स्वयं परिपूर्ण है फिर भी गुरु दक्षिणा के रूप में अपने शिष्य की ओर से तुच्छ उपहार स्वीकर कीजिये गुरुदेव। फिर दुर्योधन हीरे, माणिक मोतियों से भरी कई थालें बलराम के चरणों में बिखेर देता है। यह देखकर बलरामजी कहते हैं- दुर्योधन मैं भी तुम पर बहुत प्रसन्न हूं। द्वारिका जाने से पहले मैं भी कुछ देना चाहता हूं। तब शकुनि कहता है कि आपने तो दुर्योधन को बहुमूल्य विद्या दी है इसे और क्या चाहिये? तब बलरामजी कहते हैं- मामाजी विद्यादान भी योग्य विद्यार्थी को ही दिया जाता है।..दुर्योधन तुम्हारी योग्यता और विनम्रता को देखकर मैं अतिप्रसन्न हो गया हूं और इसीलिए मैं तुम्हें एक मनचाहा वर देना चाहता हूं, मागों क्या मांगना चाहते हो।
इस पर दुर्योधन मामा शकुनि की ओर देखता है तो शकुनि कहता है कि ये नादान तो आापसे कुछ कहने का साहस नहीं कर पा रहा है दाऊजी। तब बलरामजी कहते हैं- दुर्योधन मन में किसी प्रकार की शंका या आशंका लाने की कोई आवश्यकता नहीं है। तुम मांगो तुम्हारे मन में है जो भी है। मैं तुम्हारी इच्छा अवश्य ही पूरी करूंगा, ये मेरा वचन है।

दुर्योधन पुन: शकुनि की ओर देखकर कहता है- मामाजी आप ही बलराम भैया से बात कीजिये। ऐसा कहकर दुर्योधन प्रणाम करके चला जाता है। बलराम हंसते हैं फिर वे शकुनि से कहते हैं- मामाजी आप ही बता दीजिये क्या है दुर्योधन के मन में?...यह सु‍नकर शकुनि कहता है कि वास्तव में कहने का साहस तो मुझमें भी नहीं हो रहा है सोचता हूं कि कहीं आप अन्यथा ना लें।..दुर्योधन द्वार के पीछे खड़ा होकर यह वार्तालाप सुन रहा होता है।

शकुनि की बात पर बलराम हंसते हैं और कहते हैं कि कैसी बातें कर रहे हो मामाजी। आपके मन में क्या है यह साफ-साफ बता दीजिये। मैं बिल्कुल अन्यथा नहीं लूंगा। तब शकुनि कहता है कि दुर्योधन की जो इच्‍छा है वह मैं बता दूंगा तो आप ये ना समझे की हमनें आपकी सरलता का लाभ उठाया है।

इस पर बलरामजी कहते हैं- मैं कादादी नहीं समझूंगा। देखिये मामाजी आप मुझे बताएं कि दुर्योधन क्या चाहता है। हाथी, घोड़े, सोना, चांदी क्या चाहता है वो? तब शकुनि कहता है कि क्षमा कीजिये दाऊजी ये सब तो उसके पास है ही। कही आप क्रोध तो नहीं करेंगे? तब बलराम कहते हैं नहीं। इस पर शकुनि कहता है कि आप ये भी नहीं समझेंगे कि हमने आपका अपमान किया है? तब बलराम कहते हैं- कदापी नहीं समझूंगा मामाजी, परंतु आप ये ऐसी बातें करने से अच्छा है कि मुझे सीधे-सीधे बता दें।

इस पर शकुनि कहता हैं कि दाऊजी दुर्योधन की इच्‍छा है कि वो आपकी बहन सुभद्रा से विवाह करे। यह सुनकर बलरामजी चौंक जाते हैं और कहते हैं क्या! सुभद्रा से विवाह? यह कहकर बलरामजी सोच में पड़ जाते हैं।... फिर शकुनि कहता है कि कौरवकुल के बारे में आपको बताने की आवश्यकता नहीं दाऊजी। हस्तिनापुर का युवराज है वो और कल का राजा है और आपका शिष्य भी। यदि यादव कुल और कौरव कुल का मिलाप हो गया तो भारतदेश में एक नया युग आरंभ हो जाएगा...हां।..दुर्योधन द्वार के पीछे खड़ा होकर यह वार्तालाप सुन रहा होता है।
बलराम शकुनि बात सुनकर सोच में पड़ जाते हैं। बहुत देर तक सोचने के बाद उनके चेहरे पर मुस्कान आ जाती है और कहते हैं मामाजी मुझे आपका प्रस्ताव स्वीकार है। यादव कुल और कौरव कुल का मिलाप अवश्य होगा ये मेरा वचन है। यह सुनकर शकुनि और दुर्योधन अतिप्रसन्न हो जाते हैं।

उधर, ध्यान में बैठे श्रीकृष्ण मुस्कुरा रहे होते हैं तभी रुक्मिणी उनके पास आकर कहती है- जय हो त्रिलोकीनाथ की। प्रभु! किन लोकों में घुम रहे हैं? अब तनिक धरती पर भी आ जाइये।..यह सुनकर श्रीकृष्ण हूं कहते हुए आखें खोलते हैं और फिर कहते हैं- आपने कुछ कहा? तब रुक्मिणी कहती है जी मैंने बस इतना ही निवेदन किया है कि बाकी सारे लोग तो कुशल से ही होंगे। इस समय उनकी चिंता छोड़कर इस पृथ्‍वी लोक पर दृष्टि डालिये। यहां की समस्याओं पर भी थोड़ा ध्यान दीजिये भगवन। तब श्रीकृष्ण कहते हैं- पृथ्‍वीलोक पर क्या समस्या है देवी? तब रुक्मिणी कहती है- पृथ्‍वीलोक पर एक द्वारिका नगरी है। उस द्वारिका नगरी की राजकुमारी का विवाह आप अर्जुन से निश्‍चित कर चुके हैं तो विवाह की तैयारियां भी करनी होगी की नहीं? विवाह का मुहूर्त निकलाना होगा और फिर पांडव सम्राट युधिष्ठिर को भी तो न्योता देना होगा। मैं तो कहती हूं कि इस वक्त सारे मंत्रियों को बुलाकर आदेश दे दीजिये की विवाह की तैयारी की जाए।
तब श्रीकृष्ण कहते हैं- तुम्हारा क्या इरादा है रुक्मिणी की बलराम भैया से हमारी पिटाई कराई जाए? तब रुक्मिणी कहती है ये आप क्या कह रहे हैं नाथ? तब श्रीकृष्ण कहते हैं- ठीक ही तो कह रहा हूं देवी। दाऊ भैया की आज्ञा लिये बिना यदि द्वारिका में इस प्रकार की कोई भी घोषणा की गई तो द्वारिका में भूकंप आ जाएगा भूकंप। सुभद्रा की शादी के बारे में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार केवल दाऊ भैया को ही है। सो वह जब तक यहां आ न जाएं और स्वयं इस संबंध को स्वीकार न कर लें तब तक इस प्रकार की कोई भी घोषणा नहीं की जा सकती। सो उनके आने की यहां प्रतीक्षा तो करना ही पड़ेगी देवी।

यह सुनकर रुक्मिणी चिंतित होकर कहती है- इसका क्या अर्थ है? समझो यदि बड़े भैया ने यह संबंध स्वीकार नहीं किया तो आपने जो वचन दिया है उसका तो कोई महत्व ही नहीं रह जाएगा? यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं- बिल्कुल। अगर वो स्वीकार नहीं करेंगे तो मेरी बात का महत्व ही क्या है। देवी! वो बड़े भैया हैं जो वो कहेंगे वही होगा। मैं उनका विरोध करने का साहस भी कैसे कर सकता हूं।... यह सुनकर रुक्मिणी कहती है- यदि वो कहेंगे कि अर्जुन से लड़ो तो लड़ोगे? तब श्रीकृष्ण कहते हैं- अवश्य लड़ूंगा और पूरी शक्ति के साथ लड़ूंगा।
यह सुनकर रुक्मिणी कहती है कि यदि बड़े भैया से इतना ही डरते थे तो उन बैचारों को ये आश्‍वासन ही क्यों दिया कि उनका विवाह हो जाएगा?... यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह आश्वासन तो ठीक ही था कि उनका विवाह होगा और हो जाएगा।..तब रुक्मिणी पूछती है मगर कैसे? इस पर श्रीकृष्‍ण कहते हैं- क्योंकि ये विधि ने निश्चत कर रखा है। मैंने तुम्हें पहले भी कहा था कि सुभद्रा की संतान से ही पांडु कुल के भावी राजा का जन्म होगा, सो उनका विवाह तो अवश्य होगा। यही विधाता ने तय कर रखा है और यही विधि का विधान है। यह सुनकर रुक्मिणी निश्चंत हो जाती है फिर श्रीकृष्ण कहते हैं और जहां तक मेरे कर्तव्य के पालन की बात है तो मेरा कर्तव्य सीधा है कि अपने बड़े भाई की आज्ञा का पालन करूं। वही मेरा धर्म है यदि वो कहेंगे तो मैं अर्जुन से भी लड़ूंगा। परंतु बड़े भैया के प्रति जो मेरा धर्म है मैं उसे नहीं छोड़ सकता।...यह सुनकर रुक्मिणी कहती है- आपकी बातें और आपकी लीला कोई समझने की चेष्ठा करे तो पागल हो जाए। आपको नमस्कार है प्रभु। यह सुनकर श्रीकृष्ण हंस देते हैं।

उधर, शकुनि कई बैलगाड़ियां भरकर बलरामजी को भेंट देकर कहता है कि इनमें कुछ बैलगाड़ियों में मिठाइयां हैं, कुछ में वस्त्र और कुछ में आभूषण हैं। इन्हें द्वारिका की प्रजा में बंटवा देना यह कहकर की सुभद्रा की ससुराल से आया है। प्रजा अति प्रसन्न होगी दाऊ भैया। यह सुनकर बलरामजी कहते हैं- परंतु शकुनि मामा इसकी क्या आवश्यकता थी। तब शकुनि कहता है- थी दाऊजी थी। आप तो अब हमारे संबंधी हो गए हैं और मेरा भांजा आपका बहनोई बनने वाला है। अब आप यथाशीघ्र दुर्योधन के विवाह की तिथि निश्‍चित करें। इस पर बलरामजी कहते हैं- अवश्य ही मामाजी। फिर बलरामजी की हस्तिनापुर से धूमधाम से विदाई होती है।

बलरामजी के जाने के बाद दुर्योधन अपने मामा शकुनि के साथ पासे खेलते वक्त बहुत खुश होकर कहता है- वाह मामाजी वाह, ये पासे तो आपकी अंगुलियों पर नाचते हैं। यह सुनकर शकुनि कहता है- ये पासे तो क्या भांजे, पूरा आर्यावर्त मेरी अंगुलियों पर नाचने वाला है क्योंकि मैंने योजना ही ऐसी बना दी है और उस योजना के प्रमुख पात्र तुम हो तुम। इस बार मैं उसे धूर्त कृष्ण को उसी के घर में परास्त करूंगा..हां। तुम तो आनंद करो भांजे सुभद्रा के साथ।
तब दुर्योधन कहता है- परंतु मामाजी यदि कृष्ण ने बलराम की बात नहीं मानी तो? तब शकुनि कहता है कैसी बातें करते हो भांजे। यदि कृष्ण ने ऐसा किया तो पूरी द्वारिका में उथल-पुथल हो जाएगी। तुम्हें सुभद्रा प्राप्त होगी भांजे...अवश्य प्राप्त होगी। क्योंकि इस बार मेरे आंकड़ों से वह कृष्ण बचकर नहीं निकल सकता भांजे...नहीं निकल सकता। ऐसा कहकर शकुनि अपने हाथ के पासे भूमि पर फेंक देता है और कहता है- शकुनि नाम है मेरा शकुनि। यह कहकर शकुनि हंसने लगता है।

उधर, द्वारिका में बलरामजी के आगमन का धूमधाम से स्वागत होता है। श्रीकृष्ण दाऊ भैया के पैर छूकर उनके गले लगते हैं तो रुक्मिणी अर्जुन से कहती है- ये दोनों दो शरीर और एक प्राण है। फिर कई बैलगाड़ियों को देखकर श्रीकृष्ण कहते हैं- ये सब क्या है दाऊ भैया? तब बलरामजी कहते हैं- ये! अरे कन्हैया ये सुभद्रा की ससुराल की ओर से द्वारिकावासियों के लिए भेंट हैं। यह सुनकर श्रीकृष्ण का चेहरा उतर जाता है। तब बलरामजी सेवकों से कहते हैं- सुनो! ये सब नगर में बांट दो और घोषणा कर दो की सुभद्रा की ससुराल से मिठाई आई है। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं सुभद्रा की ससुराल! ये क्या कह रहे हो दाऊ भैया?
तब बलरामजी कहते हैं- कन्हैया मैंने सुभद्रा का विवाह निश्चित कर दिया है। तब श्रीकृष्ण आश्चर्य से पूछते हैं- किसके साथ? इस पर बलरामजी कहते हैं- दुर्योधन के साथ। यह सुनकर श्रीकृष्ण आश्चर्य से कहते हैं- दुर्योधन के साथ! बात पक्की हो गई है क्या? तब बलरामजी कहते हैं- हां कन्हैया उन्होंने मुझसे कन्या की मांग की और मैंने उसे स्वीकार करके तत्काल वचन दे दिया। भला इतना अच्छा रिश्ता मैं कैसे जाने देता?
यह सुनकनर श्रीकृष्ण दुखी होकर कहते हैं- ये रिश्ता अच्छा है कि नहीं, प्रश्न इस बात का नहीं है दाऊ भैया। इस पर बलरामजी कहते हैं- तो क्या कहना चाहते हो कन्हैया, मैंने कोई भूल की है? क्या कहना क्या चाहते हो कन्हैया बोले। इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं- मैं तो केवल इतना कहना चाहता हूं दाऊ भैया कि किसी भी कन्या का विवाह किससे किया जाए उसका निर्णय लेने से पहले उसकी सहमति लेना आवश्यक है। हां कहने से पहले हमें एक बार सुभद्रा से पूछ लेना चाहिए था दाऊ भैया।
इस पर बलरामजी कहते हैं कि मुझे उसकी आवश्यकता नहीं लगी कन्हैया। देखो कन्हैया हां कहने से पहले मेरे मन में भी क्षणभर के लिए ये विचार आया परंतु दूसरे ही क्षण मेरे मन में विचार आया कि मैं सुभद्रा को किसी अंधे कुएं में तो नहीं ढकेल रहा हूं बल्कि मैं उसे विशाल कौरव साम्राज्य की महारानी बनाने जा रहा हूं...समझे। यह कहकर बलराम हंसते हैं और श्रीकृष्ण को महल में चलने का कहते हैं।

फिर भीतर जाने के रास्ते में श्रीकृष्ण और बलराम के बीच इस विवाह को लेकर कई तरह के तर्क-वितर्क होते हैं तभी सामने से रुक्मिणी, सुभद्रा और अर्जुन आ जाते हैं। तीनों दाऊ भैया को प्रणाम करते हैं। फिर सुभद्रा कहती है- कितने दिन लगा दिए भैया। तब बलरामजी कहते हैं- सुभद्रे मेरे इतने दिनों तक वहां रहने का एक कारण यह था कि मैं तुम्हारा ही काम कर रहा था। यह सुनकर सुभद्रा कहती है- मेरा काम? मेरा कौनसा काम कर रहे थे आप? तब बलराम कहते हैं कि मैं तुम्हारे विवाह का प्रबंध कर रहा था। यह सुनकर सुभद्रा, अर्जुन और रुक्मिणी चौंक जाते हैं।
यह सुनककर सुभद्रा आशंकित होकर कहती है- मेरे विवाह का? तब बलरामजी हंसते हुए कहते हैं- फूटने लगे ना लड्डू मन में...और अगर ये सुनोगी कि विवाह किसके साथ निश्‍चय हुआ है तो होश उड़ जाएंगे होश, पैर धरती पर नहीं पड़ेंगे और अर्जुन भी यह सुनकर खुश हो जाएगा कि जिस कुरुवंश का वह वंशज है उसीके कुरुवंश में इसका विवाह तय कर दिया है।

यह सुनकर रुक्मिणी आश्चर्य से पूछती है- कुरुवंश में? तब बलरामजी कहते हैं- हां कुरुवंश के सम्राट महाराज धृतराष्ट्र के पुत्र युवराज दुर्योधन के साथ मैंने इसका विवाह निश्‍चित किया है।...यह सुनकर सुभद्रा अवाक रह जाती है और अर्जुन को भी जोर का झटका लगता है और रुक्मिणी भी अचंभित हो जाती है।
तब बलरामजी प्रसन्नता से कहते हैं- अब हमारी छु‍टकी हस्तिनापुर के विशाल साम्राज्य की महारानी बनेगी। यह सुनकर सुभद्रा को चक्कर आने लगते हैं तो रुक्मिणी हाथ पकड़कर उन्हें अपने कक्ष में ले जाती है। यह देखकर बलरामजी हंसते हुए कहते हैं- कन्हैया मैंने कहा नहीं था कि इसके होश उड़ जाएंगे, देखो वैसा ही हुआ है। फिर बलरामजी अर्जुन से कहते हैं- अर्जुन! भई तुम्हें भी बधाई हो कि द्वारिका की राजकुमारी का विवाह तय तुम्हारे बड़े भाई दुर्योधन के साथ हुआ है। महाराज युधिष्ठिर को तत्काल इस शुभ समाचार की सूचना भेजो।... अर्जुन निराश होकर कहती है- जी जो आज्ञा। जय श्रीकृष्णा।




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