Shri Krishna 10 Oct Episode 161 : युधिष्ठिर जब जाते हैं भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य से युद्ध की अनुमति लेने

bhishma pitamah
अनिरुद्ध जोशी| Last Updated: रविवार, 11 अक्टूबर 2020 (12:23 IST)
निर्माता और निर्देशक के श्रीकृष्णा धारावाहिक के 10 अक्टूबर के 161वें एपिसोड ( Shree Episode 161 ) में युद्ध के प्रथम दिन गीता के ज्ञान के बाद का रथ पुन: अपने स्थान जाकर खड़ा हो जाता है। इसके पश्चात सभी युधिष्ठिर द्वारा युद्धघोष का इंतजार करने लगते हैं। परंतु धर्मराज युधिष्ठिर अपने हथियार रथ पर ही रखकर हाथ जोड़ते हुए पैदल ही कौरव सेना की और कदम बढ़ाने लगते हैं। अब आगे..
रामानंद सागर के श्री कृष्णा में जो कहानी नहीं मिलेगी वह स्पेशल पेज पर जाकर पढ़ें...वेबदुनिया श्री कृष्णा


संपूर्ण गीता हिन्दी अनुवाद सहित पढ़ने के लिए आगे क्लिक करें... श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

यह देखकर संजय धृतराष्ट्र से कहता है कि महाराज यह तो विचित्र ही हो रहा है धर्मराज युधिष्‍ठिर ने हथियार रख दिए हैं और हाथ जोड़े भीष्म पितामह की ओर बढ़ रहे हैं। यह सुनकर धृतराष्ट्र प्रसन्न होकर कहते हैं कि युधिष्ठिर युद्ध से डर गया है क्योंकि वह जानता है कि कौरवों की सेना उनकी सेना से कहीं अधिक शक्तिशाल है।
यह देखकर अर्जुन, भीम, नुकुल और सहदेव सभी युधिष्ठिर का रास्ता रोककर कहते हैं कि बड़े भैया आप ये क्या कर रहे हैं? क्षत्रिय का धर्म है युद्ध करना और आप हथियार रखकर कहां जा रहे हैं, परंतु युधिष्ठिर किसी की कुछ नहीं सुनते हैं और वे आगे बढ़ते ही रहते हैं और आगे चले जाते हैं। तब श्रीआकर पांडवों से कहते हैं कि धर्मराज युधिष्ठर अपना धर्म निभाने जा रहे हैं आप सभी निश्‍चिंत रहें।
युधिष्ठिर भीष्म पितामह के पास जाकर कहते हैं कि हे पितामह! ये मेरा कैसा दुर्भाग्य है कि जिन चरणों की पूजा और सेवा मुझे करनी चाहिए आपके उन्हीं चरणों को छूकर आप ही के विरूद्ध युद्ध करने की आज्ञा मांगने के लिए मुझे आपके पास आना पड़ा? पितामह हम पांडवों को युद्ध करने की अनुमति और अपना आशीर्वाद दीजिये। यह सुनकर भीष्म पितामह प्रसन्न होकर विजययीभव: का आशीर्वाद देते हैं। फिर युधिष्ठिर कहते हैं कि हम धर्म की रक्षा और उसकी गरिमा का मान बढ़ा सकें तो कृपया हमें बताइये कि हमें क्या करना होगा? यह सुनकर भीष्म पितामह कहते हैं कि एक ही उपाय है कि हमारी हत्या कर दो। यह सुनकर युधिष्ठिर कहता है कि नहीं पितामह आप हमारे शत्रु नहीं हैं। यह सुनकर भीष्म पितामह कहते हैं कि युद्धभूमि पर शत्रु की सेना में खड़ा हर सैनिक शत्रु ही होता है और फिर हम तो शत्रुसेना के सेनापति हैं। इसलिए हम तुम्हारे सबसे बड़े शत्रु हुए। तुम नि:संकोच होकर हमारी हत्या कर दो।
यह सुनकर युधिष्‍ठिकर कहते हैं कि इतना बड़ा अनर्थ हमसे नहीं हो सकेगा‍ पितामह। यह सुनकर पितामह कहते हैं कि पुत्र युधिष्ठिर हमारा वध तुमसे से तो क्या जब तक हम नहीं चाहेंगे तब तक संसार के किसी भी योद्धा से नहीं हो सकेगा। यह सुनकर युधिष्ठिर कहते हैं कि ऐसी स्थिति में हम किस तरह विजय हो सकते हैं पितामह, हमारा मार्ग दर्शन करो। यह सुनकर भीष्म पितामह कहते हैं कि युधिष्ठिर इस समय हमारी समझ में कुछ नहीं आ रहा। तुम किसी और अवसर पर यह पूछना तब तक हम कोई ना कोई रास्ता अवश्य ढूंढ निकालेंगे। यह सुनकर शकुनि और दुर्योधन भड़क जाते हैं।

उधर, धृतराष्ट्र भी भड़ककर कहता है संजय तातश्री ने ये क्या किया। कौरवों के शत्रुओं को विजयश्री का आशीर्वाद दे दिया। यह सुनकर संजय कहता है कि महाराज भीष्म पितामह ने अनने शत्रुओं को नहीं अपने पौत्रों को आशीर्वाद दिया है। यह सुनकर धृतराष्ट्र कहता है कि जो तातश्री के विरुद्ध लड़ रहे हैं ऐसे पौत्र क्या उनके आशीर्वाद के पात्र हैं? ये युधिष्‍ठिर तो शकुनि और कृष्‍ण से भी कुटिल निकला।

इसके बाद युधिष्ठिर गुरु द्रोण के पास जाकर उनसे भी युद्ध की अनुमति मांगते हैं तो वे भी विजयश्री का आशीर्वाद देते हैं और कहते हैं कि हम भी यही चाहते हैं कि जीत धर्म की हो अधर्म की नहीं। परंतु जब तक मेरी आत्मा मेरे शरीर को नहीं छोड़ती, तुम युद्ध नहीं जीत सकते। इसलिए अपने गुरु की बात याद रखना तुम सब भाई मिलकर अपने गुरु की हत्या कर देना।

फिर युधिष्ठिर अपने कुलगुरु कृपाचार्य के पास जाकर कहते हैं कि आप कुलगुरु हैं, धर्मगुरु हैं परंतु इस समय मैं धर्मसंकट में पड़ा हूं कृपया मेरा मार्ग दर्शन कीजिये। यह सुनकर कृपाचार्य कहते हैं कि हे युधिष्‍ठिर! आप धर्मराज हैं और फिर भी धर्मसंकट की बात कर रहे हैं। लोग तो आपके धर्माचरण से प्रेरणा लेते हैं। फिर भी आप मुझसे मार्गदर्शन चाहते हैं। तब युधिष्ठिर कहते हैं कि युद्ध में कुलगुरु के खिलाफ युद्ध लड़ना क्या उचित है? यह सुनकर कृपाचार्य कहते हैं कि धर्म और अधर्म क्या है यह मैं भलिभांति जाता हूं। परंतु शिष्टाचार को निभाते हुए आपने मेरे विरूद्ध युद्ध करने की आज्ञा मांगी है। इसलिए जाओ मैं आपको युद्ध आरंभ करने की आज्ञा देता हूं।

यह सुनकर युधिष्‍ठिर कहते हैं कि धन्यवाद और मुझे यह भी आशीर्वाद दीजिये की मैं युद्ध में किसी भी शक्तिशाली योद्धा को परास्त कर सकूं। इस पर कृपाचार्य कहते हैं कि हे युधिष्ठिर मैं जानता हूं कि आपकी असल चिंता क्या है। मैं चिरंजीवी हूं इसलिए कोई मेरा वध नहीं कर सकता। परंतु इसकी चिंता करने की आवश्‍यकता नहीं है। इसलिए कि मेरा जीना ही पांडवों के हित में है। क्योंकि मेरी हर श्वांस आपकी विजय के लिए प्रार्थना करेगी, जाओ विजयीभव:।

यह सुनकर धृतराष्ट्र भड़ककर कहता है कि यदि कौरवों के पूर्वज और गुरु पांडवों की ही विजय की कामना करेंगे तो कौरवों का क्या होगा।...फिर युधिष्‍ठिर अपने मामा शल्य के पास जाते हैं तो वे कहते हैं कि मैं वचनबद्ध हूं। इस पर युधिष्‍ठिर करते हैं कि मामाश्री इस संसार में केवल दो ही सर्वश्रेष्ठ सारथी हैं जिनमें से एक हैं श्रीकृष्ण और दूसरे हैं आप। एक हमारे साथ हैं और एक कौरवों की सेना में। इसी तरह धनुर्धर अर्जुन जिसकी युद्ध कुशलता से युद्ध का परिणाम प्रभावित होगा। यह सुनकर शल्य कहते हैं- हां ये तो है और फिर श्रीकृष्‍ण उसके सारथी हैं तो इसलिए युद्ध का पलड़ा पांडवों का ही भारी है। यह सुनकर युधिष्‍ठिर कहते हैं कि यदि ऐसा ही कोई कुशल सारथी और कुशल योद्धा की जोड़ी कौरव ना बनाए तो। इस पर शल्य कहते हैं कि कौरव मुझ जैसे सारथी का लाभ अवश्य उठाएंगे। परंतु अर्जुन जैसा युद्ध नीति में निपुण योद्धा कौरवों में कौन हो सकता है?

यह सुनकर युधिष्‍ठिर कहते हैं कि है मामाश्री और वो है कर्ण। हां मामाश्री यदि कर्ण ने इस युद्ध का भार उठाया तो वह आपको ही सारथी बनाएगा। यदि ऐसा हुआ तो इस स्थिति में आप उसे बातों में उलझाकर उसका ध्यान भंग कर सकते हैं। हां मामाश्री ऐसा करने में कोई आपत्ति नहीं है। क्योंकि
इस तरह आप कौरवों के साथ युद्ध करके अपना वचन निभाएंगे और कर्ण का तेजभंग करके आप धर्म का साथ देंगे। यह सुनकर शल्य कहते हैं कि धर्मराज तुमने धर्म की सेवा का ये अनोखा मार्ग दिखाकर मेरे मन के बोझ को हल्का कर दिया। जाओ और युद्ध का प्रारंभ करो, ईश्वर तुम्हारे साथ है इस धर्मयुद्ध में तुम ही जीतोगे।

फिर युधिष्‍ठिर सामने खड़े श्रीकृष्‍ण और अपने भाइयों के पास जाकर खड़े हो जाते हैं और फिर से एक बार कौरवों की सेना को देखकर कहते हैं कि हे क्षत्रिय कौरव योद्धाओं! इस समय मैं दोनों सेनाओं के मध्य में खड़ा हूं। मेरे पैरों के नीचे वह रेखा है जो धर्म को अधर्म से अलग करती है। इस रेखा के पार दोनों ओर की सेनाओं का योद्धा यही मानकर युद्ध करेगा कि वह धर्म पर है। परंतु सत्य ये है कि दोनों की दोनों सेनाएं धर्म के मार्ग पर नहीं हो सकती। इसमें से एक धर्म के पक्ष पर है और एक अर्धम के मार्ग पर। परंतु आप कौरवों में से जो भी यह मानता है कि हम पांडव धर्म पर हैं। यदि वह योद्धा धर्म का साथ देना चाहता है तो यही एक क्षण है कि वह इस रेखा को पार करके हम पांडवों में सम्मलित हो सकता है।
यह सुनकर ययुत्सु अपने रथ पर से उतरकर हाथ जोड़े धर्मराज युधिष्‍ठिर के पास आकर कहता है कि मैं युयुत्सु हूं क्या आप मुझे अपने दल में शामिल करेंगे? यह सुनकर युधिष्ठिर कहते हैं कि हमारे लिए तुम्हारा स्थान हमारे दल में ही नहीं हमारे हृदय में भी है। इस तरह युयुत्सु पांडवों में शामिल हो जाता है।

यह देखकर दुर्योधन कहता है कि सौतेला भाई आखिर सौतेला ही निकला। उधर जब धृतराष्ट को यह पता चलता है तो वह कहता है कि क्या कहा मेरा पुत्र युयुत्सु पांडवों से जाकर मिल गया, असंभव असंभव।...फिर श्रीकृष्‍ण अपना पांचजन्य शंख फूंककर युद्धघोष करते हैं। दूसरी ओर से भीष्म पितामह भी अपना शंख फूंकते हैं। इस तरह संपूर्ण युद्ध भूमि में शंख ध्वनि गूंज उठती है।
उधर, दासी आकर द्रौपदी से कहती है- महारानी युद्ध आरंभ होने वाला है। शंखों की ध्वनि सुन रही हो ना? यह सुनकर द्रौपदी कहती है कि कैसे नहीं सुनूंगी मंगला। केवल यही एक ध्वनि तेरह वर्षों से मेरे कानों में गूंज रही है। तेरह वर्षों तक हर रात मेरे सपनों में शंख बजते रहे हैं। फिर द्रौपदी अपने अपमान के बारे में बताकर दु:शासन के प्रति घृणा व्यक्त करती है और कहती हैं कि वह दिन आएगा तब उसके रक्त से अपने बाल धोऊंगी तो मेरे बाल पवित्र हो जाएंगे।

संजय बताता है कि हे महाराज अब कौरव और पांडवों के बीच महाभयंकर युद्ध होने जा रहा है। पांडवों के सेनापति धृष्टदुम्न आक्रमण का आदेश देने वाले हैं।...
फिर धृष्टदुम्न और भीष्म पितामह आक्रमण का आदेश देते हैं और युद्ध प्रारंभ हो जाता है। फिर जयद्रथ और भीम में युद्ध होता हुआ बताया जाता है। जयद्रथ को भीम घायल कर देता है।

संजय बताता है कि भीम के प्रहार से महारथी जयद्रथ अचेत हो गए हैं। उसके सारथी ने रथ को रणभूमि से हटा दिया है। भीम के इस आतंक से युवराज दुर्योधन व्याकुल हो गए हैं।...दुर्योधन अपनी इस चिंता को कृपाचार्य के समक्ष प्रकट करता है तो कृपाचार्य कहते हैं कि आप ठीक ही सोच रहे हैं युवराज। यदि भीम को रोका नहीं गया तो वह पागल हाथी की तरह अकेला ही कौरवों की सेना को कुचल डालेगा। यह सुनकर दुर्योधन कहता है कि परंतु ऐसा कौन है जो इस पागलहाथी पर अंकुश लगा सके। यह सुनकर अश्वत्थामा कहता है कि मैं लगाऊंगा इस पागल हाथी पर अंकुश।
फिर भीम और अश्‍वत्थामा का युद्ध होता है। अंत में भीम अपनी गदा फेंककर अश्वत्थामा को घायल कर देता है। द्रोणाचार्य उसे संभालते हैं और कहते हैं कि सारथी शीघ्र ही रथ को यहां से कहीं ओर ले चलो।...

फिर संजय बताता है कि राजा भगदत्त राजा विराट से और युधिष्‍ठिर अपने मामा शल्य से युद्ध करते हैं। राज द्रुपद सिंधु नरेश जयद्र से युद्ध कर रहे हैं। प्रौपदी के पांचों पुत्र, सुभद्र पुत्र अभिमन्यु, उलूपी पुत्र इरावान ये सब भी कौरवों के साथ लड़ रहे हैं और द्रुपद पुत्र शिखंडी बाल्हिक के साथ युद्ध कर रहे हैं। युवराज दुर्योधन पांडु पुत्र नकुल से लड़ रहे हैं। पितामह भीष्म ने तो पांडवों की सेना में हाहाकार मचा दिया है और पितामह को रोकने के लिए पार्थ सारथी वासुदेव उनका रथ लेकर उनके सामने आ गए हैं।

फिर अर्जुन अपना पहला तीर पितामह भीष्म के चरणों में छोड़कर उन्हें प्रणाम करता है। पितामह कहते हैं कि हे धनंजय हमने तुम्हारे अनोखे प्रणाम को स्वीकार किया। फिर अर्जुन कहता है कि परंतु अब यदि मेरे बाण आपका अनादर करें तो मुझे क्षमा कीजियेगा। यह सुनकर ‍भीष्म कहते हैं कि प्रिय पुत्र युद्ध में शत्रुओं का आदर नहीं उसका आखेट किया जाता है। तुम नि:संकोच होकर बाण चलाओ। फिर अर्जुन और भीष्म के बीच युद्ध होता है तो अर्जुन संकोचवश ही इधर-उधर ही बाण चलाता है और भीष्म पितामह के तीरों से बचता रहता है। तब श्रीकृष्‍ण कहते हैं कि सोच क्या रहे हो पार्थ अपने शत्रु पर डटकर वार करो। फिर दोनों में घमासान युद्ध होता है।
भीष्म अपने तीरों से अर्जुन के रथ को पीछे धकेल देते हैं। यह देखकर अभिमन्यु कहता है ये क्या हो रहा है सारथी रथ वहां ले चलो। फिर अभिमन्यु भीष्म पितामह के सामने जाकर पहले उन्हें प्रणाम करता है और फिर अपने तीरों से उनके ऊपर फूलों की वर्षा कर देता है। यह देखकर अर्जुन और भीष्म पितामह दोनों की आश्चर्य और प्रसन्नता व्यक्त करते हैं। फिर अभिमन्यु कहता है कि सावधान पितामह अब मेरे बाण मर्यादाओं की सीमा से परे युद्ध के नियमों का पालन करने जा रहा है। फिर दोनों में घमासान युद्ध होता है और भीष्म पितामह अभिमन्यु के रथ का पहिया तोड़ देते हैं और सारथी से कहते हैं- आगे बढ़ो।
आगे शिखंडी रोककर कहता है कि पितामह भीष्म पहचाना मुझे, मैं द्रुपद पुत्र शिखंडी हूं। यह सुनकर पितामह कहते हैं कि तुम्हें पहचानने की क्या आवश्यकता शिखंडी, जाओ मैं नारियों से युद्ध नहीं करता। फिर शिखंडी कहता है कि पहले के जन्म में न केवल आपने मेरा दिल तोड़ा था बल्कि मेरा जीवन भी नष्ट कर दिया था। याद है ना आपको कि मैं अम्बा के रूप में जन्मा था। और, मैंने अपने उसी जन्म का बदला लेने के लिए फिर जन्म लिया है और इस बार आपको मुझसे युद्ध करना होगा। यह सुनकर भीष्म कहते हैं कि मैं केवल पुरुषों से युद्ध करता हूं। किसी निर्बल स्त्री पर हाथ नहीं उठाता। मैंने कहा ना जाओ यहां से। यह सुनकर शिखंडी कहता है कि अब में निर्बल नहीं मुझसे दो-दो हाथ करके देख लीजिये आपका भ्रम टूट जाएगा और आपको पता चल जाएगा कि मैं नर हूं या नारी। यह सुनकर भीष्म कहते हैं कि तो तुम ऐसे नहीं मानोगी। ऐसा कहकर भीष्म उसके रथ का पहिया अपने बाण से तोड़ देते हैं और कहते हैं- जाओ बेटी जाओ, पहले अपना रथ ठीक कराओ और उसके बाद युद्ध करने की सोचना, चलो सारथी आगे। जय श्रीकृष्णा।
रामानंद सागर के श्री कृष्णा में जो कहानी नहीं मिलेगी वह स्पेशल पेज पर जाकर पढ़ें...वेबदुनिया श्री कृष्णा




और भी पढ़ें :