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Shri Krishna 21 Sept Episode 142 : भरी सभा में जब होता है द्रौपदी का चीरहरण
निर्माता और निर्देशक रामानंद सागर के श्रीकृष्णा धारावाहिक के 21 सितंबर के 142वें एपिसोड ( Shree Krishna Episode 142 ) में जब युधिष्ठिर अपने राजपाट सहित द्रौपदी को भी हार जाता है तो दु:शासन द्रौपदी को बालों से पकड़कर भरी सभा में घसिटकर लाता है। फिर दुर्योधन द्रौपदी की ओर देखकर कहकर कहता है- हे द्रौपदी आओ, आओ द्रौपदी और आकर हमारी गोद में बैठ जाओ। यह सुनकर भीम क्रोधित होकर कहता है- दुर्योधन तुने मेरी पत्नी का अपमान किया है। इस सभा में मैं प्रतिज्ञा लेता हूं कि तुने जिस जांघ पर बैठने का आदेश दिया है उन जांघाओं को मैं तोड़कर रख दूंगा और सुन ले दु:शासन जिन हाथों से तुने द्रौपदी के बाल पकड़े हैं उन बालों को मैं तेरे रक्त से धोऊंगा।
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इसके बाद द्रौपदी का चीहरण होता है तो द्रौपदी श्रीकृष्ण को पुकारती हैं और तभी श्रीकृष्ण उस वक्त अपनी माया से वहां प्रकट होकर द्रौपदी की साड़ी को इतना लंबा कर देते हैं कि उसे खींचते-खींचते दु:शासन थक जाता है। यह देखकर कौरव पक्ष चौंक जाते हैं। द्रोण और विदुर धृतराष्ट्र को भला-बुरा कहकर धर्म की बातें बताते हैं तो धृतराष्ट्र कहते हैं- आज द्युतसभा में जो कुछ हुआ उसका हमें खेद हैं। मैं पांडवों को उनका राजपाट वापस करता हूं। यह सुनकर दर्योधन भड़क जाता है और कहता है- इस तरह तो द्युतक्रीड़ा एक खेल बनकर रह जाएगा। जुएं के खेल में कोई जीतता और कोई हारता है और हारने वाले को कुछ न कुछ हारना ही होता है।
आखिर एक फैसला होता है कि पांडव बारह वर्ष के लिए वनवास और एक वर्ष के लिए अज्ञात वास में जाएंगे। शर्त ये भी थी कि यदि एक वर्ष के अज्ञातवास में उन्हें पहचान लिया गया तो फिर से उन्हें बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास झेलना होगा। पांडव धृतराष्ट्र की आज्ञा अनुसार अपने राजसी वस्त्र त्यागकर वनवास जाने के लिए तैयार हो जाते हैं। अपनी माता कुंती की आज्ञा से वे वनवास चले जाते हैं।
फिर उधर, श्रीकृष्ण से रुक्मिणी पूछती है- आपने द्रौपदी तो द्युतसभा में उसके अपमान से तो बचा लिया परंतु आपने वहां जाने से विलंब से काम क्यों लिया प्रभु? इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं- देवी! मनुष्य जब तक संसारी प्राणियों से सहायता मांग रहा हो, भगवान तब तक उसकी सहायता कैसे कर सकता है? इसलिए द्रौपदी ने सबसे निराश होकर जब मुझे सहायता के लिए पुकारा तो मैं तुरंत ही सहायता के लिए पहुंच गया। फिर रुक्मिणी कहती है- परंतु अब उनकी सहायता करने वाला कोई नहीं है प्रभु। तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि अब भाग्य ही उनकी सहायता करेगा देवी।
फिर कुंती जाती है गांधारी और धृतराष्ट्र के पास और वहां फिर तीनों में इस घटना को लेकर चर्चा होती है। कुंती अपना दु:ख व्यक्त करती है और अंत में कहती है कि मैं इस राजमहल में नहीं रह सकती अब मैं विदुर के यहां रहने जा रही हूं।
फिर पांडव अपनी पत्नी पांचाली के सहित वनवास चले जाते हैं। वन में जाकर वे अपनी कुटिया बनाते हैं। जय श्रीकृष्णा।
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