महाशिवरात्रि पर विशेष : परम कल्याणमय हैं आशुतोष शिव

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किसी वाद्य की आवश्यकता नहीं, मुंह से बाजा बजा दीजिए- बिना किसी विदेशी (बाह्य) वस्तु के पूजन की अनुपम विधि! एक माने में शिव स्थानीय सामग्री के उपयोग के प्रथम ‍अधिवक्ता हैं, शायद ही किसी अन्य ने स्थानीय सामग्री का इतना अच्‍छा उपयोग सुझाया है।

अपने अद्वैत रूप को कायम रख ब्रह्मवैवर्त पुराण में शिव अपना आप बिसारकर कृष्ण की स्तुति कर उन्हें अखिल विश्व का स्वामी निरूपित करते हैं। यह ‍विनय नम्रता दृष्टव्या है। शिवजी कहते हैं- आप विश्वरूप हैं, विश्व के स्वामी हैं, विश्व के कारण, विश्व के आधार हैं, विश्व रक्षक, विश्व संहारक हैं। आप ही फलों के बीज हैं, फलों के आधार हैं, फलस्वरूप भी हैं और फलदाता भी।

वस्तुत: हर‍ि (विष्णु), हर (शिव) एक ही 'ह' धातु से बने हुए दो शब्द हैं। अंतर केवल 'इ' और 'अ' प्रत्यय का है। मूल प्रकृति 'ह' एक ही है। यह प्रत्यय भेद है अर्थ भेद नहीं, क्योंकि मूल प्रकृति एक है। 'सर्वाणि पापानी दु:खानि व हरतीति हरि: अथवा हर:' के अनुसार पाप या दुखों का हरण करने से 'हरि' हुए, इसलिए 'हर' भी हुए।

हरि हो या हर काम एक ही है अपनों के दु:ख हरना। महास्तो‍त्र महिम्न के रचनाकार के अनुसार, 'यदि काले पहाड़ के समान काजल की राशि हो और सिंधु उसके घोलने का पात्र बने और उस लेखनी को हाथ में लेकर कागज पर स्वयं सरस्वतीदेवी निरंतर लिखती जाए तो भी परमेश्वर तुम्हारे गुणों का पार नहीं पा सकती।' इस प्रकार शिव वर्णनातीत है।

लोकतंत्र के आधार ज्ञान, समता और शांति हैं और ये ही पूजन सामग्री शिव की प्रियतम सामग्री है अत: वे लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रथम अधिष्ठाता-अधिवक्ता है- नमन
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