क्या था बालि की शक्ति का राज, जानिए

में ऐसा प्रसंग आता है कि एक बार जब बालि संध्यावंदन के लिए जा रहा था तो आकाश मार्ग से नारद मुनि जा रहे थे। बालि ने उनसे अभिवादनपूर्वक पूछा कि कहां जा रहे हो? तो नारद ने बताया कि वे लंका जा रहे हैं, जहां लंकापति रावण ने देवराज इन्द्र को परास्त करने के उपलक्ष्य में राज भोज का आयोजन किया है।

कुछ देर रुकने के बाद नारद ने चुटकी लेते हुए कहा कि अब तो पूरे ब्रह्माण्ड में केवल रावण का ही आधिपत्य है और सारे प्राणी, यहां तक कि देवतागण भी उसे ही शीश नवाते हैं। नारद से ऐसी बातें सुनकर बालि ने कहा, 'हे मुनिवर! रावण ने अपने वरदान और अपनी सेना का इस्तेमाल उन लोगों को दबाने में किया है जो निर्बल हैं, लेकिन मैं आपको बता दूं कि मैं उनमें से नहीं हूं और रावण के भोज में जा रहे हैं तो यह बात रावण को स्पष्ट कर दें।'

नारदजी ने बालि की यही बात रावण को जाकर बढ़ा-चढ़ाकर बताई जिसे सुनकर रावण क्रोधित हो गया। उसने अपनी सेना तैयार करने के आदेश दे डाले। नारद ने रावण से भी चुटकी लेते हुए कहा कि एक वानर के लिए यदि आप पूरी सेना लेकर जाएंगे तो आपके सम्मान के लिए यह उचित नहीं होगा। ऐसे में रावण ने बालि से अकेले ही लड़ने की ठानी। वह अपने पुष्पक विमान में बैठकर बालि के पास जा पहुंचा।

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