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Written By WD

सपनों का हमसफर सच से अलग

परिवार
- नम्रता नदीम

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सुरभि के घर का वातावरण ऐसा था, जहाँ अक्सर माँ की बातें ही अंतिम कानून होती थीं। सुरभि जब भी अपने आगामी जीवन के बारे में सोचती थी तो उसके मन में अपने परिवार की ही छोटी दुनिया थी। हाँ, कभी-कभी वह अपने परिवार के बारे में यह सोच लेती थी कि वह अपने पति पर अपनी माँ की तरह भारी नहीं पड़ेगी।

परिवार में उसे भी कुछ स्थान देगी। शादी के बाद जीवन ने उसे कुछ नए रंग ही दिखाए। उसके जीवनसाथी अशोक की नजर में उसकी महत्ता एक गृहिणी से अधिक नहीं थी। जीवन के सारे निर्णयों के संदर्भ में वह संप्रभु था। अलग पृष्ठभूमि से आई सुरभि के लिए यह वातावरण बहुत घुटन भरा था, जिसमें वह समायोजित नहीं हो पा रही थी।

शादी जीवन की नई शुरुआत है, लेकिन जीवन को खंडों में बाँटकर नहीं देखा जा सकता है। यहीं पर परेशानी शुरू हो जाती है जब शादी में विविध पृष्ठभूमियों से आए जो़ड़ों के सामने पुराने जीवन की कल्पनाएँ यथार्थ और जीवंतता को झुठलाने का प्रयास करती हैं। हर लड़की और लड़के के कल्पना का संसार शादी के बाद के यथार्थ संसार से अनुकूलित नहीं हो पाता।

सामान्य मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि अधिकतर लड़कियाँ अपने पिता के व्यक्तित्व से प्रभावित होती हैं जबकि लड़के अपनी पत्नी के स्वभाव में अपनी माँ को खोजते हैं। लेकिन इस चेतन जगत की यही विशेषता है कि इसमें किसी एक ही वृक्ष के दो पत्ते भी एक से नहीं होते। अब किसी लड़के या लड़की को उनके माँ या पिता जैसा दूसरा व्यक्तित्व कहाँ से मिले? जीवन तो हर पल नया है।

बेहतर यही होगा कि जीवन के इस नएपन को बिलकुल यथार्थ रूप में स्वीकार करें। यही इस जीवन की विशेषता और सत्य है। बहुत ज्यादा काल्पनिक या फिल्मी सपनों की जगह असल में मिले जीवन को बिना ज्यादा तर्क-वितर्क और अपेक्षा के साथ जिएँ। इससे आप आने वाले सुंदर दिनों के सरप्राइजेस का भी खुले दिल से लुत्फ ले पाएँगे।

चलिए एक और उदाहरण से बात को समझते हैं। वर्तिका की समस्या कुछ अलग है। उसने सौरभ जैसे पढ़े-लिखे और बिजनेसमैन लड़के से बहुत सोच-समझकर प्रेम विवाह किया। वह अधिक महत्वाकांक्षी नहीं थी, बस एक ही तमन्ना थी एक छोटी-सी प्रेमभरी दुनिया जिसमें वह और सौरभ बिलकुल खुश रहें।

शादी हुई, उसे वह प्रेमभरी दुनिया भी मिली जिसकी उसने कल्पना की थी, लेकिन अब वह स्वयं को कुछ छली हुई महसूस करने लगी। प्रेम के दिनों और शादी के शुरुआती दिनों में उस पर प्रेम की बरसात करने वाला सौरभ कुछ अधिक ही यथार्थवादी होने लगा।

वहीं सौरभ जो उसके बुलाने पर सारे महत्वपूर्ण कार्य छोड़कर सिर्फ उसका होकर उसके सामने उपस्थित होता था। अब संडे को साथ रहने के लिए कहने पर वह वर्तिका को यह कहकर समझाता है कि 'हमें अपने और बच्चों के फ्यूचर के लिए भावनाओं से बाहर निकलना होगा।'

गृहस्थी की गाड़ी सही ढंग से चलने के लिए पति-पत्नी के दोनों के वैचारिक और भावनात्मक संतुलन की आवश्यकता होती है। इन दोनों में किसी भी स्तर पर चोट या असहमति सारे जीवन को प्रभावित करती है। बेहतर यही होगा कि अपने जीवनसाथी के स्वभाव पर भावनात्मक कल्पनाएँ आरोपित नहीं करें।

क्योंकि कोई भी अपना स्वभाव आपके अनुसार नहीं ढाल सकता। यदि अपने हमसफर के साथ ही आगे की यात्रा करनी है जो जैसा है उसे वैसा ही स्वीकार करें अन्यथा वैवाहिक जीवन को सुखी करने का अन्य कोई मार्ग नहीं है
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