1. लाइफ स्‍टाइल
  2. »
  3. नायिका
  4. »
  5. डोर रिश्तों की
Written By ND

बवाल न मचाए आपकी जुबान

वामा
- प्रीती जैन

ND
ND
बोलने से पहले न तौलने की आदत कई बार बोलने वाले को काफी हास्यास्पद स्थिति में डाल देती है, तो कई बार बेवजह का बवाल भी पैदा कर देती है। इसीलिए बोलने से पहले सोचने का अक्सर सुझाव दिया जाता है। कई बार बोलने वाले का मंतव्य बड़ा सीधा होता है, लेकिन उसका असर उल्टा पड़ जाता है।

जैसा मेरी चचेरी बहन दिव्या के साथ हुआ। दिव्या की सास की मृत्यु हो गई सो तेरहवीं का कार्यक्रम था। काफी लोग आए हुए थे। सभी दुःखी-गमगीन बैठे हुए थे। अंत में कुछ इधर-उधर की बातें हुईं और सब उठकर जाने लगे तो एकाएक दिव्या बोली- 'इस जगह को अच्छे से देख लीजिएगा जिससे फिर कभी दोबारा आने में परेशानी न आए। काफी बड़ा हॉल है। सोच रही हूँ अपनी बेटी की शादी में लेडीज संगीत का कार्यक्रम इसी हॉल में कर दूँ अच्छा रहेगा।'

दिव्या का ऐसे माहौल में यह सब कहना सबको ही चौंका गया। खुद दिव्या को भी कहने के बाद अहसास हुआ कि वह गलत कह गई। शायद इस समय यह सब नहीं कहना चाहिए था, पर अब क्या किया जा सकता था? दिव्या की तरह ही कई लोग हैं, जो बिना सोचे-समझे कहीं भी कुछ भी बोल देते हैं। उनके दिल में कुछ गलत न होते हुए भी अन्य लोग उनके प्रति गलत धारणा बना लेते हैं और उनकी छवि गड़बड़ा जाती है। मेरी सहेली स्मिता की भी यही आदत है कि जो भी मन में आता है बिना देखे-भाले, जाने-समझे कह देती है।

एक बार ऐसे ही वह अपनी सास से बोली, 'मम्मी आप हीरे का बढ़िया-सा सेट इस दिवाली ले ही लो, आपके साथ-साथ मेरा भी फायदा हो जाएगा। आपके लिए तो पैसे खर्च करने से राहुल मना नहीं करेंगे, जो भी आप पसंद करेंगी दिला ही देंगे। थोड़े दिन आप पहनना फिर आपके बाद तो मुझे पहनना है ही!' बस, यही बात को उनको इतनी चुभ गई कि आज तक उनके मन में स्मिता को लेकर एक खराश बनी हुई है।

कई बार हमारे द्वारा बिना सूझे-बूझे आगे-पीछे जाने बिना ऐसा बोल दिया जाता है जिससे स्वयं की स्थिति खराब होने से कम पढ़े-लिखे, कम अक्ल और बेवकूफ होने का लेबल तो लगता ही है, साथ ही जरा-सी गलत बात संबंधों में खटास पैदा कर देती है। इसका यह मतलब कतई नहीं है कि आप बोलें ही नहीं। बोलें लेकिन कब, कहाँ, कैसे और क्या बोलना है इस पर ध्यान दें।

और हाँ, यदि कभी आपके साथ भी ऐसा हो जाए कि दूसरे आपकी कही बातों को गलत अंदाज में सोचें तो गलतफहमी से बचने के लिए जल्दी ही सामने वाले से स्पष्ट कर दें कि इसके पीछे ऐसा कोई मतलब नहीं था, न ही किसी तरह का कोई सार या तात्पर्य है जिससे किसी के दिल को ठेस पहुँचे या स्वयं मुझे ही भावनाहीन माना जाए, यकीन मानिए! यह सोचना कि मैंने तो ऐसा कुछ नहीं कह दिया कि दूसरे को बुरा लग जाए और फिर अहंकारवश अथवा ईगो के वशीभूत हो नजरें फेरकर चल देने से बहुत अच्छा यही रहेगा कि आप अपनी सफाई में जरूर कुछ कहें। इससे जहाँ एक ओर रिश्तों में मिठास बनी रहेगी वहीं दूसरी ओर आपकी साफगोई व स्पष्टवादिता भी औरों की नजरों में आपको प्रशंसा का पात्र बना देगी।
लेखक के बारे में
ND