बनाकर रखें बुजुर्गों का साया....
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शर्माजी को इतना अधीर देख कुछ लोगों ने तो पूछ भी लिया कि मुहूर्त के लिए कौन-सी ड्रेस बनवा रहे हैं, आखिर इतने बड़े शोरूम के मालिक जो बनने जा रहे हैं, पर यह क्या? जहाँ सभी को लग रहा था कि माता-पिता से ही फीता कटवाकर सर्वप्रथम दुकान में प्रवेश होगा, वहाँ तो नजारा ही दूसरा था। बेटे ने उद्घाटन उनसे न करवाकर शहर के उच्च पद पर प्रतिष्ठित एक व्यक्ति से करवाया। कार्यक्रम के दौरान वहाँ जितने भी अन्य अफसर या नेता थे, उन्हीं को खास तवज्जो दी जा रही थी, पारिवारिक सदस्यों या अन्य रिश्तेदारों की कम ही पूछताछ हो रही थी। इन सबमें छोटा बेटा तो मशगूल था ही, साथ ही दोनों भाई भी उन्हीं व्यक्तियों से संपर्क बनाना या बातचीत करना चाह रहे थे, जो कभी भविष्य में काम आ सकते थे।
यह सिर्फ एक परिवार की नहीं, वरन घर-घर की कहानी हो रही है, जहाँ माता-पिता अपनी जिन्दगीभर की मेहनत व कमाई बच्चों को किसी लायक बनाने में खर्च कर देते हैं, वहाँ बच्चे इतना भी नहीं सोचते कि अलग से कुछ न देकर केवल मान-सम्मान, थोड़ी-सी खुशी ही हम उन्हें दे दें। ताकि वे इसी में गर्व महसूस कर संतुष्ट हो सकें कि प्यार-अपनत्व की मजबूत डोरी से सब एक-दूसरे के संग बँधे हैं और परिवार का महत्व जैसा उनके समय में था, आज भी बरकरार है।
ऐसे ही अब कुछ दिन पहले रीना की बेटी के जन्मदिन की काफी बड़ी पार्टी थी, उसमें दिल्ली से उसके सास-ससुर भी आए, जो कि अपनी पोती को गोद में लिए काफी खुश लग रहे थे। जब केक काटने का समय आया तो सबको यही लगा कि चलो दादा-दादी के स्नेहमयी हाथों से प्यारी बिटिया अपनी पहली वर्षगाँठ का केक काटेगी, पर थोड़ी देर में रीना उनकी गोदी से बेटी को स्टेज पर ले गई व अपने पति के साथ मिलकर केक कटवा दिया। बेचारे माँ-बाप की तरफ देखा तक नहीं कि वो किधर हैं, कहाँ बैठे हैं? और कुछ भी नहीं तो कमसे कम उनको इतना हक व सम्मान दे देते कि वे अपनी पोती को स्वयं गोद में लेकर केक ही खिला दें, पर आज किसके पास इतना सोचने का वक्त है, किसको चिंता है?
यह तो सर्वविदित है कि जो आज बच्चा है, उसे कल जवान फिर बूढ़ा होना है। वक्त बार-बार अपने को दोहराता है, किसी के लिए रुकता नहीं है। इसलिए इस बात पर गौर करके इसे महत्वपूर्ण जानकर आपस में विचार-विमर्श करना जरूरी है कि जो कुछ भी हम कर रहे हैं या हो रहा है वह सही नहीं है। आज जैसे संस्कार, गुण हम अपने बच्चों को देंगे, जैसा व्यवहार उनके सामने बड़ों से करेंगे, वैसा ही कल वे हमारे साथ करेंगे। क्योंकि यह कहावत तो सबने सुनी ही है, 'जैसा बोएँगे, वैसा ही काटेंगे।' अतः अभी भी समय रहते यदि हमने अपनी आदतों में सुधार नहीं किया, अपने में बदलाव नहीं लाए तो फिर जिस तरह की अपेक्षाएँ, तमन्नाएँ हमारी अपने बच्चों से हैं, वे कभी भी पूरी नहीं हो सकेंगी तथा सिवाय पछतावे के और कुछ भी हासिल नहीं होगा।
जो सच है उसे चाहकर भी कोई अनदेखा नहीं कर सकता, हमारे बड़ों ने हमेशा कुछ न कुछ हमें दिया ही है, आज भी बेवजह वे कभी लेने की इच्छा जाहिर नहीं करते और तो और इस उम्र में भी घर-परिवार में अप्रत्यक्ष रूप से कहीं न कहीं उनके अनुभव व उनकी सहायता का लाभ हमलेते ही रहते हैं। फिर भी हम उतनी भी उनकी देखभाल नहीं करते जितना कम से कम हमारा फर्ज बनता ही है। इतना सब होने के बावजूद भी यह उनका बड़प्पन, स्नेह ही है कि फिर भी उनके पास हमें देने के लिए ढेर-सा प्यार व आशीर्वाद होता है और यह हम भली-भाँति जानते हैं कि इसके आगे पैसे या भौतिक सुख सुविधा का महत्व कुछ भी नहीं रह जाता, सब नगण्य है।
सभी माता-पिता को अपनी औलाद से उम्मीद रहती है कि वे किसी काबिल बनकर उनका नाम रोशन कर सकें, यदि उनकी यह मुराद पूरी हो जाए तो बहुत अच्छा और ना हो तब भी वात्सल्यपूर्ण व ममतामयी होने के कारण वे तनिक भी अफसोस नहीं करते। वृद्धावस्था आते ही जरूर उनके मन में यह आस व इच्छा प्रबल हो जाती है कि अपनों से थोड़ा लगाव, अपनापन व मान-सम्मान मिल जाए। ताकि जीवन के जो भी गिने-चुने शेष दिन बचे हैं उनमें किसी तरह का उतार-चढ़ाव न देखकर सिर्फ और सिर्फ प्यार की ही छाँव देखने को मिले और जब भी ऊपर वाले का बुलावा आए तो खुशी-खुशी चैन से आँखें मूँद सकें। खैर! सुबह का भूला यदि शाम को घर लौट आए तो भी देर नहीं होती, अच्छे कर्मों की एक नई शुरुआत हम तभी कर सकते हैं।
कहने का सार यही है कि यदि हम बुजुर्गों की इज्जत करेंगे तो हमारा जीवन सुखमय हो जाएगा, क्योंकि सेवा-सुश्रुषा करने से कोई भी दुःख या विपदाएँ उनकी दुआओं से नहीं आएँगी और घर में भी सुख-समृद्धि, संपन्नता खुद ब खुद ही आ जाएगी। इस सत्य को सदैव ध्यान में रखना चाहिए कि हमारे सिर पर यदि बड़ों का ममतामयी हाथ है तो फिर दुनिया में हमसे ज्यादा भाग्यशाली, ज्यादा सुखी और कोई नहीं हो सकता है।
