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दोस्त जैसे हों शिक्षक

गुरु-शिष्य के रिश्तों में आई गहराई

शिक्षक
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बदलते वक्त के साथ अब गुरु-शिष्य के रिश्तों में भी बदलाव आया है और अब इस रिश्ते में आत्मीयता व मित्रता का समावेश होकर ये रिश्ता और भी गहरा बन गया है।

कल तक हमारे देश में गुरुकुल शिक्षा प्रणाली थी, जिसमें बच्चों को कठोर अनुशासन में रखा जाता था। उस वक्त उनके लिए गुरु एक कठोर आदेशकर्ता ही होता था उसका मित्र नहीं। जिससे वह केवल किताबी ज्ञान ही हासिल कर सकता था।

लेकिन अब परिवेश बदल चुका है। आज गुरु बच्चों के दोस्त बन रहे हैं, जिनसे वे बेझिझक अपने मन की बात तथा अपनी समस्याओं का हल पूछते हैं।

हम हैं तुम्हारे दोस्त :-
कहते हैं बच्चों की पहली पाठशाला उसके माँ-बाप होते हैं किंतु उनकी दूसरी पाठशाला उनके गुरु होते हैं, जो उन्हें जीवन की सही दिशा दिखाते हैं। यदि गुरु कठोर होगा तो वह कभी बच्चों से दोस्ताना संबंध कायम कर उन्हें समझ नहीं कर पाएगा।

बच्चों को समझने के लिए गुरु को भी उनकी तरह बच्चा बनना पड़ता है। गुरु या शिक्षक में भी इस गुण का होना बेहद जरूरी है। क्या बच्चों के साथ प्यार से पेश आकर उन्हें कुछ सिखाया नहीं जा सकता है? यदि हाँ, क्यों न इसी तरकीब को अपनाया जाए?

हर बच्चा होता है अलग :-
जब एक ही माँ-बाप के दो बच्चों की आदतों, सोच एवं कार्यशैली में बहुत कुछ अंतर होता है तो फिर एक ही कक्षा में पढ़ने वाले हर बच्चे की ग्राह्य क्षमता में अंतर होना तो स्वभाविक ही है। शिक्षक को चाहिए कि वह बच्चे की कमजोरी को समझकर उसे दूर करने का प्रयास करें न कि सबके सामने बच्चों की उलाहना करे।

हाल ही में प्रदर्शित फिल्म 'तारे जमीन पर' की कहानी में एक शिक्षक और छात्र के बारे में बताया गया है। इस फिल्म की लोकप्रियता का कारण भी इसकी जबरदस्त कहानी व कुशल अभिनय के माध्यम से एक आम समस्या को दर्शकों के सामने रखना है।

इस फिल्म की कहानी असल जिंदगी के ऐसे कई बच्चों की कहानी है जो पढ़ाई में कमजोर होते हैं और अपने माँ-बाप व शिक्षक की डाँट-फटकार से तंग आकर स्वयं को उपेक्षित महसूस करते हैं। ऐसे हालात में कई बार वो कोई गलत कदम भी उठा लेते हैं।

हर कोई है खास बच्चा :-
हर बच्चे में कोई न कोई खूबी होती है। बस जरूरत है तो बस उस खूबी को तराशकर उसे बच्चे की पहचान बनाने की। यह काम केवल एक बेहतर शिक्षक ही कर सकता है।

जब सभी बच्चे एक साथ बैठकर एक ही सबक पढ़ते हैं तो उनमें से कोई एक शिक्षक का चहेता और दूसरा निकृष्ट क्यों? शिक्षक तो समाज का एक ऐसा वर्ग है, जिसका काम बगैर किसी भेदभाव के बच्चों को शिक्षित करना है। तो फिर यह भेदभाव क्यों?

आज बच्चों को एक कठोर शिक्षक से ज्यादा अपने साथ मौज-मस्ती करने वाले एक साथी की जरूरत है, जो उन्हें समझ सकें। तो क्यों न आप भी एक शिक्षक की बजाय इन बच्चों के एक अच्छे दोस्त बन जाएँ?
लेखक के बारे में
गायत्री शर्मा