पापा, आप टहलना शुरू कर दो...
निवेदिता भारती
"पापा इतना वजन बढ़ा लिया है कि बस।" भाई बोला
"चलना तो बिल्कुल बंद कर दिया है। थोड़ी सी दूर भी जाना हो तो गाड़ी पर जाएंगे।" बहन बोली
"घी बंद कर दो इनका पूरी तरह से।" मैंने कहा।
तीन बच्चे और तीन तरह की शिकायतें। पापा की कमियां उतनी बढ़ जाती हैं जितने बच्चे होते हैं और खासकर जब वह बड़े हो जाते हैं। जब हम तीनों छोटे थे तो पापा से खूब इंप्रेस थे। हमारे पापा बहुत अच्छे दिखते थे। हम तीनों भाई बहन बैठकर हमारे पापा से अपनी अपनी डिमांड की लिस्ट बनाते रहते थे। दिनभर की मम्मी की शिकायतों की अलग लिस्ट होती थी। मम्मी को अक्सर यह धमकी सुनने को मिलती थी कि पापा के आने पर उनकी खैर नहीं होगी।
असल में मेरे पिताजी ने हम तीनों भाई बहन की बिल्कुल न के बराबर ही पिटाई की। डांट पड़ने पर ही रोना शुरू हो जाता था। एक तरह से डरते भी थे पर इतना यकीन जरूर था कि पापा से किसी की शिकायत की तो बस पापा सब देख लेंगे। अब चीजें बदल गई हैं। हालांकि मेरे पापा को ऐसी कोई खास बीमारी नहीं है। सभी की तरह उन्हें ब्लड प्रेशर है पर खासतौर से वजन परेशानी बन गया है। हम तीनों भाई बहन अब हमारे पापा से परेशान हैं।
हजार बार कहकर थक गए हैं कि चलना फिरना बंद मत करो पर वह हैं कि घुटनों के दर्द के कारण थोड़ा भी नहीं चलते। जब हम सब लोग इकट्ठे होते हैं तो हमारे यहां एक एक करके सभी पापा कि गलत बातों को निकालते हैं। जिस पर वो कभी हंसतें तो कभी अपनी सफाई देते हैं। कभी आश्वासन और कभी चिढ़ जाते हैं।
मैं जब कम उम्र की थी तो बहुत बचपना था मुझमें। कुछ बातें मुझे भी याद हैं। एक बार मेरे पापा बीमार थे और कोई मिलने आया था। उस समय पापा उनसे मिलना नहीं चाहते थे तो उन्होंने मेरी मम्मी को कहा कि जाकर कह दो कि वे घर पर नहीं है। पापा की किस्मत खराब कि मैं भी ये सब सुन रही थी और इससे पहले की मेरी मम्मी जाकर कुछ कह पातीं मैं दौड़ कर गई और कहा कि पापा कह रहे हैं कि वे घर पर नहीं हैं। इतना सुनने पर आए हुए लोग हंसने लगे। मम्मी ने अंदर जाकर बता दिया कि मैंने ऐसा कह दिया है। आखिरकार पापा को आना ही पड़ा और उसके बाद मैं काफी देर पापा की गोद में ही बैठी रही। मुझे बड़े होने पर पता चला कि मैं ऐसी कॉमेडी किया करती थी और मेरे पिताजी सब सहन कर लेते थे। मुझे तब कुछ भी एहसास नहीं था क्योंकि मैं तो हमेशा मजे से मेरे पापा की गोद में चढ़ जाती थी।
इसके अलावा मेरे साथ मेरे पिताजी के धैर्य की एक और घटना मुझे याद आती है जिसमें एक बार मुझे बहुत देर तक पापा के पास उनके ऑफिस में रूकना पड़ा। किसी काम से पापा उनके बॉस के कमरे में गए और मैं भी दौड़कर साथ में चल दी। अंदर केबिन में पहुंचने के बाद मेरे पापा ने बेटा साहब को नमस्ते बोलो। पर मैं ढीठ की तरह खड़ी रही, बस बात नहीं मानी तो नहीं मानी।
मुझे ऐसा लगता है कि मैं बचपन में अड़ती ज्यादा थी। घर में सबसे छोटी और भाई बहन के लाड़ में कभी-कभी बात नहीं मानती थी। पर पापा मुझे नहीं याद कि हम तीनों को ही ज्यादा कुछ कहते थे। आराम से तीनों ही खेलते कूदते रहते थे। मेरा भाई जब छोटा था तो पापा उसे खिलौने की कार चला चलाकर दिखाते थे जिस पर वह ताली बजाता था। मुझे और मेरी बहन को पापा गुड़ियाएं लाकर देते थे। पापा जब भी बाहर जाते मैं उनसे गुड़िया लाने का कहती थी। वैसे हमेशा लाकर नहीं देते थे क्योंकि मेरे पास एक खूब बड़ी गुड़िया थी और मुझे लगता है कि मम्मी मुझे ज्यादा गुड़िया दिलाने के पक्ष में नहीं थीं। इसके अलावा मेरे पास छोटी साइज की और भी गुड़ियाएं थी तो कोई जरूरत भी नहीं थी।
हम सभी काम की वजह से अलग अलग शहरों में हैं। जब हम मिलते हैं हम लोग इसी विचार में रहते हैं कि पापा को सुबह घूमने भेजा जाए। सब लोग कहते हैं थोड़ा ही चलो। जगह-जगह सीमेंट की कुर्सियां लगी हैं उन पर बैठ जाना। इसके अलावा हमारी कॉलोनी में ही ऐसे बहुत से लोग असमय नहीं रहे जिन्होंने चलना फिरना बंद कर दिया था। डर लगता है हम तीनों भाई बहन को। पापा चलते नहीं है। अभी तो सबसे बड़ी समस्या यही दिखती है कि कैसे उन्हें चलने के लिए तैयार किया जाए। पापा खूब एक्टिव हैं। गाड़ी पर तो खूब घूमते हैं। बाहर के सारे काम वही निपटा देते हैं पर चलते नहीं हैं। इस फादर्स डे पर बस यही मांगते हैं पापा से कि पापा आप टहलना शुरू कर दो।"