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Written By WD
Last Updated : शनिवार, 20 जून 2015 (12:35 IST)

पिता पर कविता- अंदर से वे धीर हैं

पिता
चेहरा भले गंभीर है 
अंदर से वे धीर हैं ।
कहते कम हैं सुनते सब 
ऐसी कुछ तासीर है ।।
 

मोटा सा चश्मा हैं पहनते 
रोज सुबह और शाम टहलते ।
उम्र हुई जो उनकी अब,  
कभी हैं चिढ़ते, कभी बहलते।। 
 
सारी बातें, छोटी मोटी, 
चिंता उन्हें हर बात की होती।
काम हैं सारे बहुत ही खास 
जैसे कोई उंची चोटी ।।
 
उनके जैसा ना कोई होना 
हीरा हो सा चांदी सोना ।
चाहे जग में सब खो जाए ।।