दो स्वर्ण जीतने वाले पहले अफ्रीकी बिकिला

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दम निकालने वाली मैराथन में कोई एथलीट नंगे पैर 26 मील से अधिक का फासला ओलिम्पिक के रिकॉर्ड समय में तय करके स्वर्ण जीत ले। वह भी एक नहीं दो-दो बार, तो उस एथलीट को 'कीर्ति पुरुष' ही कहा जा सकता है। इथियोपिया के अबेबे बिकिला ऐसे ही कीर्ति पुरुष थे। मैराथन की कोई भी चर्चा बिकिला के बगैर अधूरी ही कही जाएगी।

इथियोपियाई सेना के इस जाँबाज सैनिक को प्रतिदिन सुबह सैन्य शिविर तक पहुंचने के लिए लंबी दौड़ लगाना पड़ती थी। सेना में होने वाली खेलकूद स्पर्धाओं में बिकिला वक्त-वक्त पर अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करते रहते थे, लेकिन कोई बड़ा अवसर नहीं मिल पा रहा था उन्हें।

फिर आया रोम ओलिम्पिक 1960, जिसके लिए इथियोपिया के खिलाड़ियों का चयन हो रहा था। बिकिला आशान्वित तो थे लेकिन वे रोम जाने वाले दल में अतिरिक्त खिलाड़ी के रूप में ही चुने जा सके। समस्या यह थी कि उन दिनों देश के खेल संघ की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी और बिकिला जैसा अतिरिक्त खिलाड़ी तो खेल संघ पर एक प्रकार से 'अतिरिक्त बोझ' ही था। ऐन वक्त पर एक प्रमुख खिलाड़ी हो गया बीमार, बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा और बिकिला को दल में प्रवेश मिल गया।
रोम में वे अफ्रीकी महाद्वीप की ओर से ओलिम्पिक स्वर्ण जीतने वाले पहले खिलाड़ी बने। वह भी बगैर जूते के दौड़कर। उन्होंने दो घंटे 15 मिनट 16.2 सेकंड का समय निकाला। मैराथन में ओलिम्पिक का नया कीर्तिमान बन गया। बिकिला ने चेक धावक एमिल झेटोपेक द्वारा 1952 (हेलसिंकी) में स्थापित कीर्तिमान (2 घंटे 23 मिनट 03.2 सेकंड) को ध्वस्त कर दिया।

इथियोपिया व अफ्रीकी महाद्वीप की ओर से ओलिम्पिक स्वर्ण जीतने वाले पहले खिलाड़ी के रूप में बिकिला आगे आए। टोक्यो ओलिम्पिक (1964) में मैराथन स्वर्ण की होड़ में 15 एथलीट शामिल थे, इनमें ब्रिटेन के बैसिल हीरले भी थे, जो मैराथन के विश्व कीर्तिमानधारी थे।
एक-डेढ़ माह पहले हुए ऑपरेशन के बाद भी बिकिला ने दो घंटे 12 मिनट 11.2 सेकंड का समय देकर एक बार फिर स्वर्ण जीता। इस तरह नया ओलिम्पिक कीर्तिमान स्थापित किया। यह मैराथन इतिहास का सबसे कम समय था और बिकिला ओलिम्पिक मैराथन में दो स्वर्ण जीतने वाले पहले मैराथनी। अपने इस कीर्तिमानी समय (2:12.11.2) के साथ बिकिला ने 1972 तक ओलिम्पिक में राज किया।
1976 (मांट्रियल) में पूर्व जर्मनी के डब्ल्यू. सियरपिंस्की ने दो घंटे 9 मिनट 55.0 सेकंड से स्वर्ण जीतकर बिकिला को पीछे किया था। इस महान एथलीट का अंतिम समय बड़ा ही बुरा गुजरा।

वे लगातार दूसरा ओलिम्पिक स्वर्ण जीतने पर सरकार द्वारा मिली कार चला रहे थे, तभी एक दुर्घटना में उनके मस्तिष्क की नस फट गई। कुछ दिन बिकिला जीवन-मृत्यु के छलावे से जूझे। आखिरकार 25 अक्टूबर 1973 को उनकी मृत्यु हो गई।



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