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प्रवासी कविता : मेरी सीनियारिटी बरकरार है...

senior citizen poem
- हरनारायण शुक्ला


 
 
 
हाल ही में भारत गया, भीड़ में लगा कि भटक गया हूं, 
अजीब है, मैं अपने ही शहर में अब अजनबी बन गया हूं। 
 
मैं कभी भारतीय नागरिक था, अब अमेरिकन बन गया हूं,
मैं कोई मंगल ग्रह से नहीं आया, पर यहां 'एलिअन' बन गया हूं। 
 
कभी सुनता था भूले-बिसरे गीत बिनाका गीतमाला में,
वही गीत अब सुनता हूं ऑनलाइन या अपने आइपॉड में। 
 
गांव, तालाब, मंदिर, पीपल और नीम के पेड़ ओझल होते गए,
मेट्रोडोम, टारगेट स्टोर, हाईवे 35 और 94 दिमाग में छाते गए।
 
मैं कभी सीनियर अफसर था, अब सीनियर सिटीजन हूं, 
मेरी सीनियारिटी बरकरार है, मैं तो इसी में बहुत खुश हूं।