लघुकथा : कई बातें सिर्फ कहने की

story

अभी फ़ोन रखा गया। दिल में अब भी कई बातें हैं। कई बातें सिर्फ कहने की होती हैं, दिलों पर उनका वजूद कुछ भी नहीं होता। अच्छा, मैं तुम्हें फ़ोन करता हूं और वह फ़ोन कभी नहीं होता। इंतजार, इंतजार... बदल जाते हैं, परंतु वह कभी ख़त्म नहीं होता।
मुझे कोई आवाज दे रहा है, मुझे दूसरा कॉल आ रहा है, शायद दरवाजे पर कोई दस्तक दे रहा है, फलां को मुझसे कुछ पूछना है। समझ जाओ, अगला तुमसे बोर हो चुका है। तुम्हारा दु:ख-सुख, हंसी-ख़ुशी, परेशानी, सफलता-असफलता सब कहीं ताक पर रखकर भूल चुका है। तुम्हारी भावनाएं दूसरे के समय की बर्बादी है। इंसानियत दिखाओ, जाने भी दो। तुम भी ऐसा ही करते हो? ओह। नहीं करते तो सीख जाओ।

वो दिन जब दोस्तों, पड़ोसियों और भाई-बहनों के साथ छत पर बैठ चांद को ताकना, तारों में आकृतियां ढूंढना, शाम 7 बजे चमचमाते शुक्र और बुध का तारों से पहले निकलना, हर दिन के हर पहर में आसमान के बदलते रंगों को निहारना, एक साइकल से चल बड़ी डिग्रियां हासिल करना, महीने में एक समोसा खाकर खुश हो जाना, पड़ोस की आंटी का तुम्हें एक कप चाय पिलाना, दो बिस्किट खिलाना, जिसका अहसान मान सारी जिंदगी तुम्हारा आदर में झुके रहना। वो सब कहने की बातें, जब ख़ुशी से दिल लबालब भरा होता था।

वो दिन गए, जब बची सूखी रोटी भी व्यर्थ नहीं जाती थी। गली के कुत्ते और गाय से इस बहाने पहचान बन जाती थी। चिड़िया, कौवे व गिलहरी कभी शिकायत नहीं करते थे उस सूखी रोटी की। पानी में भिगो व गीली कर, खाकर पेटभर अहसान माना करते थे। वो चोर काली बिल्ली को भी पता होता था कि तुम बालकनी में डटे हुए हो तो आज दूध की चोरी नहीं हो सकती। परंतु आज तो फ़ोन से ही तुम्हारे लाखों लुट जाते हैं- जज़्बात, ईमान, दोस्ती, दिल, प्यार-मुहब्बत, पैसा।

बुरा न मानना। पहले होली दिलों की खेली जाती थी। ऐसे रंग चढ़ते थे, जो उतारते नहीं उतरते थे जिसके चक्कर में चमड़ी उधड़ जाती थी। लाल बालों संग कई-कई दिन घूमते मन कुढ़ता था, शर्म आती थी, पर हंसी आती थी। फिर उन यादों को दिल में बसा कई बातें बतियाई जाती थीं, नई यादें बुनी जाती थीं। अगली होली का बेसब्री से इंतजार होता था।

जलती होली संग बताशे, कुरकुरे, चिरौंजी और नारियल का टुकड़ा जब पड़ोस वाली भाभी हाथ की कलाई पर मुस्कराते रखती थीं, तो सब कुछ कितना मीठा हो जाता था। दो कुरकुरे जलती होली में स्वाहा करने पर भी कितनी कंजूसी करते थे।

जी ललचाता था कि उन मीठे कुरकुरों को व्यर्थ न करें और पेट में भर लें, क्योंकि उन दो कुरकुरों से मन भर जाया करता था। आज फेसबुक पर वही भाभी मुस्कराती पोज़ मारकर खड़ी दिखीं। उनका आज जन्मदिन है। बधाई दे देते हैं एक लाइक मारकर और एक लाइन लिखकर। पुरानी यादों का रंग अब भी चटख हरा है और कुरकुरों का स्वाद जबान पर।

परंतु फेसबुक उन जज्बातों को भाभी तक पहुंचा पाएगा? चतुर फेसबुक भी सारा अकाउंट रखता है सारी भावनाओं का, जैसे सालभर में तुम्हें कितने लाइक्स मिले, आज किससे तुम्हारी दोस्ती हुई, कितने साल गुजर चुके हैं, शेयर कर बता दो। सालों का वो हिसाब याद रखने की जरूरत नहीं है और अब मन की भावनाओं से तुम आज़ाद हो जाओ। पहले मन सारी जिंदगी उन्हीं रिश्तों में उलझा रहता था।

इस साल ऑनलाइन द्वारा कइयों को होली के रंग भेजे, कइयों को गुझिया भेजी, जो दूसरों से हमें मिली हमने भी फॉरवर्ड कर दी। दिमाग चला लिया हमने, अपने रंग बिखेर लिए, पर इस होली याद नहीं कितनों पर बिखेरे। न ही होंठों पर मुस्कान आई, न ही आत्मा पर रंग चढ़ा। पर एक याद जरूर है सिमटी दिल में कि सिल्वर ऑइल पेंट कलर बचपन में कब, किस पर बिखेरा था? जिसे तकलीफ पहुंचाई थी, जी चाहता था वो मनमीत बने, हमसफ़र बने, उस याद के रंग आज भी सुर्ख हैं, सूखे नहीं हैं।

रोज-रोज पर ढेरों संदेश आते हैं, ढेर सारे वीडियो आते हैं- जीवन कैसे जियो? रिश्ते कैसे निभाओ? मंजिल कैसे पाओ? सपनों को कैसे पूरा करो? कुछ संदेश पढ़ लेते हैं, कुछ वीडियो खोल लेते हैं। कई संदेश न पढ़ते हैं, न वीडियो को देखते हैं। बिना देखे ही फॉरवर्ड कर देते हैं दूसरों को सीख देने के लिए अपनी अंगुलियों के इशारे से और अपने मन के राजा स्वयं बन जाते हैं। फिर भी क्यों यह मन इतना बेचैन रहता है? सपने, मंजिल, जीवन, रिश्ते आज भी कई प्रश्न हैं?

देश में आतंकवाद से लड़ते-मरते व शहीद होते सैनिकों को ढेरों श्रद्धांजलि देते हैं। दूसरों को उकसाते हैं- मैसेज शेयर करो और फॉरवर्ड कर दिया करते हैं। परंतु भविष्य में देश की बागडोर संभालने के लिए जो उम्मीदवार खड़ा है, उसी को 'पप्पू' पुकारकर उस पर चुटकुले बना जनतंत्र का अपमान कर लेते हैं।

भूल जाते हैं हम डॉक्टर्स हैं, इंजीनियर हैं, शिक्षक हैं, लेखक, व्यापारी व बैंकर्स हैं, पुरानी पीढ़ी से अधिक पढ़े-लिखे हैं। हमारा मौलिक अधिकार और मौलिक कर्तव्य छोड़ स्वयं पप्पू बन जाते हैं, फिर 15 न्यूज़ चैनल्स को बदल-बदलकर देखकर देश में लगी आग से अपना मन जला लेते हैं।

बच्चों को बैठकर लिखाने-पढ़ाने की जिम्मेदारी तो गूगल ने अच्छे से उठा रखी है। कभी नहीं बोलता कि 'बाद में आना'। उसके पास वक्त ही वक्त है। एक प्रश्न पूछो तो इत्मीनान से 2,500 उत्तर ढूंढकर आता है, कभी नहीं थकता। क्लास में भी अब बच्चे टीचर से नहीं, लैपटॉप से आंखें मिलाकर शिक्षा पा रहे हैं। शिक्षक, शिक्षक नहीं चौकीदार ज्यादा बन गए हैं। बाथरूम व पानी की अनुमति सिर्फ शिक्षक से मांग कक्षा में बच्चे गूगल से ज्ञान अर्जित कर सारा दबाव स्वयं ले रहे हैं।

गूगल, फेसबुक, व्हॉट्सएप, ई-मेल, टेक्स्ट, ट्विटर व इंस्टाग्राम भावनाओं की बाढ़ से प्रदूषित हैं। सबके मन भावनाओं से खाली हो चुके हैं।

ओह! अलार्म बजा फ़ोन का। मेरा मनोचिकित्सक से आज अपॉइंटमेंट है। कहने को कहने की कई बातें हैं, वजूद उनका दिल पर कुछ भी नहीं है। मैं आने वाले फ़ोन कॉल का इंतजार नहीं करूंगा, क्योंकि अब मैं भी समझ चुका हूं। पैसा है, मनोचिकित्सक है, अपनी भावनाएं स्वयं संभाल लूंगा।

अगले महीने मेरा जन्मदिन है। जानती हूं सभी के संदेश मिल ही जाएंगे। फोन पर इतने सारे की उनकी गिनती भी याद नहीं रहेगी, फिर भी एक भी याद बुन नहीं पाएगी। अब मेरे पास समय नहीं है ये सारे प्रश्न पूछने का, 'मनुष्य ने जन्म क्यों लिया? क्यों बीमारी और वृद्धावस्था आती है? मौत सबके लिए क्यों सुनिश्चित है?'

दुःख-सुख जीवन के दो समान पहलू हैं। परिवर्तन समय की नियति है। शिव क्या है? हमारे कर्मों का आशय, अर्थ और दिशा क्या हो? समय नहीं किसी गौतम बुद्ध, शंकराचार्य या गुरु नानक के पास बैठकर सत्संग करूं, ज्ञान पाऊं, प्रश्न पूछूं?

धर्म-अधर्म, ज्ञान-विज्ञान, आचार-व्यवहार, राजनीति-कूटनीति, सहनीति, सेवा-मानवता- ये सारी जानकारियां जो बुद्ध के ज्ञान से ज्यादा न्यूटन, अलबर्ट आइंस्टीन के ज्ञान से भी ज्यादा ऑनलाइन उपलब्ध है। हां, उसके लिए इंटरनेट और पॉवर की जरूरत होती है। कभी इंटरनेट चला गया या पॉवर चला गया तो मैं अंधेरों में डूब जाऊंगा।

भगवान से एक छोटी-सी प्रार्थना है कि ऐसा कभी न हो। मैं इंसान बहुत कुछ सीख गया हूं, सयाना-श्याणा हो गया हूं, परंतु मेरे विकास के लिए पॉवर जरूरी है। तेरी दुनिया में उसी से तो जुड़ा हुआ हूं। मुझे कल क्या करना है, यह भी पता नहीं। कैलेंडर में सबकुछ फीडेड है। दिल पर इन बातों का कोई वजूद नहीं।


और भी पढ़ें :