क्लाइमेट एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की रिहाई के तुरंत बाद केंद्र सरकार ने लद्दाख की जनता को झटका देते हुए कहा है कि उनकी पूर्ण राज्य और छठी अनुसूची की मांग पर विचार नहीं होगा। पर लद्दाख की जनता और उनके प्रतिनिधि इन मांगों को शामिल किए बिना कोई बातचीत करने को तैयार नहीं है।
सूत्रों के अनुसार लद्दाख के प्रतिनिधियों द्वारा समय-समय पर उठाई गई सभी मांगों पर चर्चा करने और उन पर विचार करने के लिए केंद्र सरकार तैयार है - जैसे कि नए जिलों का औपचारिक गठन, बजट में की गई कटौती को बहाल करना, विकास कार्य आदि। लेकिन, साथ ही, केंद्र चाहता है कि केंद्र शासित प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची का दर्जा देने के मामले में अन्य विकल्पों पर भी विचार करें, जो दोनों पक्षों (केंद्र सरकार और लद्दाख के निकायों) को स्वीकार्य हों।
दरअसल केंद्र सरकार का मानना है कि केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा लद्दाख के लोगों की मुख्य मांग थी, जिसे 5 अगस्त, 2019 को मान लिया गया था। इसके अलावा, लद्दाख के लिए पांच नए जिलों की घोषणा भी की गई थी; जबकि पहले यहां केवल दो जिले थे, जिससे अगस्त 2024 तक जिलों की कुल संख्या बढ़कर सात हो गई है।
हालांकि केंद्र सरकार ने लद्दाखियों द्वारा उठाई गई दो मुख्य मांगों (पूर्ण राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची का दर्जा) में से किसी को भी पूरी तरह से खारिज नहीं किया है, लेकिन उसने यह लगभग स्पष्ट कर दिया है कि वह पूर्ण राज्य का दर्जा देने के पक्ष में नहीं है।
इसके बजाय, वह लद्दाख को किसी अन्य रूप में सुरक्षा-उपाय देने के लिए तैयार है, जिस पर उच्चाधिकार प्राप्त समिति की बैठकों के दौरान आपसी सहमति बन सकती है - फिर चाहे ये बैठकें कभी भी आयोजित हों।
बहरहाल, मौजूदा समय में लद्दाखियों के प्रतिनिधि अपने रुख में किसी भी तरह की नरमी लाने के मूड में नहीं दिख रहे हैं। उनका कहना है कि वे पूर्ण राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची के दर्जे की अपनी मांग पर पूरी तरह से कायम हैं, और उन्होंने पिछले साल नवंबर में केंद्रीय गृह मंत्रालय को सौंपे गए एक विस्तृत दस्तावेज़ के माध्यम से अपनी इन मांगों को पूरी तरह से उचित भी ठहराया है।
जानकारी के लिए एलएपी और करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस इस सीमा क्षेत्र में जारी आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं, जिसका चार सूत्रीय एजेंड लद्दाख के लिए छठी अनुसूची और राज्य का दर्जा, लेह और करगिल के लिए अलग-अलग संसदीय सीटें और स्थानीय नौकरियों की भर्ती के लिए लोक सेवा आयोग की स्थापना है।
एलएबी के सह-अध्यक्ष चेरिंग दोरजे लाकरूक कहते हैं कि हम अपनी चार मांगों की सूची पहले ही केंद्र सरकार को सौंप चुके हैं। दुर्भाग्य से इस पर कोई सकारात्मक प्रगति नहीं हुई है. ताजा प्रदर्शन सरकार पर सार्थक वार्ता फिर से शुरू करने के लिए दबाव बनाने के लिए था, ताकि लद्दाख के लोगों के लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकार बहाल हो सकें।
पिछले साल 24 सितंबर को लेह में हुई हिंसा में चार प्रदर्शनकारियों की मौत के बाद एलएबी-केडीए गठबंधन ने गृह मंत्रालय की उच्च स्तरीय समिति के साथ दो दौर की बातचीत की है। यह एचपीसी 2019 में लद्दाख को जम्मू कश्मीर से अलग कर बिना विधानसभा वाले केंद्र शासित प्रदेश में बदलने के बाद वहां के लोगों की मांगों पर विचार करने के लिए बनाई गई थी। हालांकि एलएबी-केडीए और गृह मंत्रालय के बीच बातचीत अब तक अनिर्णायक रही है, लेकिन लद्दाख प्रशासन ने पिछले सप्ताह एलएबी से प्रदर्शन पर पुनर्विचार करने की अपील की थी। Edited by : Sudhir Sharma