safe driving for life : जो परिवार से करते हैं प्यार, वो हेलमेट से कैसे करें इंकार ???



इन दिनों परीक्षाएं चल रहीं हैं। बच्चे व्यस्त हैं। बच्चों के परीक्षा केंद्र आने-जाने के लिए पालकगण अपने हिसाब से अलग अलग व्यवस्थाएं करते हैं। लेने छोड़ने वालों के साथ साथ कुछ बालक बालिकाएं भी अपने स्वयं के वाहन का भी इस्तेमाल करते हैं।

कल की ही बात है दो बच्चियां जो बी.कॉम.प्रथम वर्ष की हैं परीक्षा देने अपनी गाड़ी एक्टिवा से डबल सवारी आईं। आते समय एक स्कूल बस के साथ हो गया। दोनों बुरी तरह घायल अवस्था में परीक्षा केंद्र पहुंची। प्राथमिक उपचार के बाद कक्ष में जा पाई पर दर्द ज्यादा था,चोट अंदरूनी बाहरी दोनों थीं।

ये दुर्घटना चौराहे की थी अतः पुलिस वालों की नजर में आ गई। स्कूल बस संबधित थाने में खड़ी करवा ली गई थी। इस पूरे घटनाक्रम में सब कुछ तो दुखद था ही उससे भी ज्यादा खतरनाक उन बच्चियों का बिना पहने गाड़ी चलाना साथ ही लाइसेंस न होना भयंकर डरावना बिंदु था और बेहद अफसोसजनक भी।

आज इंदौर के अखबारों में दसवीं के तीन छात्रों के एक्सीडेंट की खबर प्रमुखता से छपी है। उनमें से एक बच्चे का जन्मदिन था। तीनों में एक की मौत, एक कोमा में और एक दहशत में है।

कितनी हैरानी की बात है कि हम सब कुछ जानते समझते हुए भी अपनी ही जान के दुश्मन बने होते हैं और दूसरों से उम्मीद करते हैं कि वो हमारी जान की हिफाजत करें। आए दिन शहर में कैम्पेनिंग होती हैं हेलमेट के महत्व और अनिवार्यता पर। लाइसेंस और गाड़ी संबंधित
कागजातों को ले कर।

सारे मीडिया,संचार माध्यमों से इनको ले कर प्रचार-प्रसार किया जाता है ताकि जन साधारण तक ये महत्वपूर्ण जानकारियां आसानी से पहुंचे। पर फिर भी हम हैं कि बाज ही नहीं आते हैं...चौराहे-चौराहे पर विज्ञापन प्रसारित हो रहे हैं। यातायात सप्ताह कार्यक्रम किए जा रहे हैं। उसके बावजूद हम हम खुद के प्रति गैरजिम्मेदार हुए जा रहे हैं।

मेरा निजी मत है कि इन सबमें सबसे बड़ी गलती घर के सदस्यों की या माता-पिता की होती है। अति प्यार जताने के चक्कर में वे अपने प्रियों को गाड़ियां तो दिला देते हैं पर संबंधित अनिवार्यताओं की जानकारी से उनको वंचित रख और लापरवाह हो जाते हैं। सडक पर गाड़ियां चलाने के तौर-तरीके, हॉर्न बजाने का इस्तेमाल, स्पीड कुछ भी ध्यान नहीं देते।


क्यों नहीं समझ पाते कि भले ही मान्यता ये हो कि यमराज का वाहन भैंसा है, उस पर सवार हो हाथ में रस्सी फंदा ले वो यमलोक ले जाने आते हैं पर हम भी तो अपने लोगों को असमय काल के द्वारे बेलगाम मशीनों की सवारी दे क्लच, एक्सीलेटर, ब्रेक हाथों में दे कर यमराज को सौंपने सप्रेम भेंट तैयार करते हैं। उनकी जिंदगी के सबसे बड़े दुश्मन तो हम ही हैं न।


क्यों नहीं ध्यान देते हैं कि जब हमारे घर का कोई भी सदस्य किसी भी गाड़ी को ले कर घर से बाहर निकल रहा है तो उसने हेलमेट पहना की नहीं, सारे जरूरी कागजात हैं की नहीं, लाइसेंसधारक वयस्क है की नहीं। सिर्फ इतना ही नहीं उन सभी के गाड़ी चलने के तौर तरीके पर भी नजर रखिए।

हम महिलाएं यह कह कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकतीं कि यह उनका काम नहीं है। आजकल बच्चों को स्कूल बस स्टॉप छोड़ने-लेने से लेकर बाजार,नौकरी,घरेलू काम,पारिवारिक जिम्मेदारियां सभी तो निबाह करना पड़ रहा है। घूमतीं रहती हैं दो या चार पहिये की सवारी करते।


धुआं उगलती गाड़ियां लेकर दौड़ने वालों को, तेज हॉर्न बजने वालों को, नशा करके गाड़ी से कलाबाजी करने वालों को, ट्रेफिक सिग्नल तोड़ने की शेखी बघारने वालों को, कट मार कर गाड़ी चलने वाले तीसमारखांओं को हम रोकने का प्रयास तो कर ही सकतीं हैं। हम भी सारे नियमों का पालन करें और सभी को पालन करना सिखाएं.
अब इस भाग दौड़ भरी जिंदगी में ममतामयी मां होने के साथ साथ कई सारे नए-नए पाठ आपकी पालन-पोषण की जिम्मेदारी की किताब में जुड़ते जा रहे हैं जिनका पालन न कर पाना नजर हटी दुर्घटना घटी को अंजाम दे सकता है।


धुआं उगलती गाड़ियों से जहर होती हवाएं, बढ़ते तेज शोर से ख़त्म होती शांति, तेज गति से उड़ता धूल मिट्टी, ट्रिपल और उससे भी ज्यादा की सवारी, खुद से बेपरवाह और दूसरों के प्रति लापरवाही हो रही दुर्घटनाओं से बढ़ते मौत के आंकड़ों में अपना अपशगुनी योगदान दे रहे हैं।

पर्यावरण की विरासत संभाल कर उन्हें देने मात्र से ही नहीं उसे कैसे सहेजा जाए यह भी हमें ही तो सिखाना होगा न। क्योंकि रोड एक्सीडेंट में सबसे ज्यादा होने वाली मौतों में दो पहिया वाहन से होने वाले एक्सीडेंट में होने वाली मौतों का का प्रतिशत सबसे ज्यादा है।

जिस तरह हम अपने परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य और लंबी उम्र की कामना के लिए व्रत उपवास,पूजापाठ,धार्मिक उत्सवों की भागीदारी करते हैं वैसे ही इन सभी सावधानियों को अपने नित्यकर्म में अपना कर व्यावहारिक रूप से क्रियान्वित करें। यही उनके प्रति हमारा सच्चा प्यार और जिम्मेदारी है। आपस में प्यार करें, तोहफे में गाड़ियों के ईनाम भी दें, वादा भी निभाएं पर उसके साथ-साथ चेतावनी और सावधानी भी समझाएं।
क्योंकि कोई भी वाहन उस उस्तरे के समान होता है जो उसकी सही उपयोगिता और सावधानी से बरतना जानता होगा तो उसका इस्तेमाल हजामत बनाने में ही करेगा, वरना बंदर के हाथ लगा तो दूसरों को और खुद को ही नुकसान पहुंचाएगा.. इतने सब के बाद भी यदि हम नहीं जागरूक होते तो मर्जी है आपकी... जिंदगी है आपकी ....परिवार है आपका....पर जो करते हैं अपनों को प्यार वो सावधानियों को नहीं करते इंकार...


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