'राजा साहब' ज्योतिरादित्य सिंधिया क्या मध्यप्रदेश में भाजपा के नए पॉवर सेंटर?
ग्वालियर। मध्यप्रदेश की राजनीति में श्रीमंत और महाराज के नाम से जाने पहचाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया जब मार्च 2020 में कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुए तो उन्होंने अपनी छवि बदलने की पुरजोर कोशिश की। खुद कई मौकों पर ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मंचों से अपने को श्रीमंत और महाराज कहने पर आपत्ति जताई। सिंधिया लगातार यह मैसेज देने की कोशिश कर रहे है कि वह भाजपा के एक अनुशासित कार्यकर्ता के तौर पर काम कर रहे है, वहीं सिंधिया को लेकर कांग्रेस ने भी कई मौके पर तंज कसते हुए कहा कि भाजपा में जाने के बाद महाराज अब भाईसाहब हो गए है।
महाराज और भाई साहब के संबोधन की सियासत की इस फेहरिश्त को गुरुवार को उस वक्त एक नया मोड़ आया जब भाजपा के नंबर-2 के नेता और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को उन्हीं के गढ़ ग्वालियर में आयोजित एक सरकारी कार्यक्रम में राजा साहब कह कर संबोधित कर दिया। दरअसल ग्वालियर के मेला ग्राउंड में मोहन सरकार के 2 वर्ष पूरे होने पर आयोजित अभ्युदय मध्यप्रदेश समिट में जब अमित शाह मंच से बोलने आए तो उन्होंने ज्योतिरादित्य सिंधिया को राजा साहब ज्योतिरादित्य सिंधिया के नाम से संबोधित किया है। अमित शाह ने जैसे ही सिंधिया को राजा साहब कह कर संबोधित किया पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा।
वहीं केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के ज्योतिरादित्य सिंधिया को राजा साहब के संबोधन से प्रदेश की सियासत में नए कयासों को जन्म दे दिया है। सवाल यह कि क्या अमित शाह ने अपने संबोधन के जरिए सिंधिया के सियासी कद बढ़ाने के संकेत दिए है या राजा साहब का संबोधन महज एक औपचारिकता। सवाल यह भी है कि अमित शाह ने अपने संबोधन के जरिए सिंधिया को प्रदेश की राजनीति में एक पॉवर सेंटर के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है।
पांच साल पहले कांग्रेस से भाजपा में आने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थकों को लेकर अब भी ग्वालियर-चंबल के साथ प्रदेश में भाजपा का एक खेमा अपने को असहज महसूस करता है तो दूसरी ओर सिंधिया और उनके समर्थकों पर भाजपा में कांग्रेस के गुटबाजी कल्चर को बढ़ावा देने के आरोप लगते आए है। बात चाहे अपने समर्थक मंत्रियों को अपने प्रभाव वाले जिलों में प्रभारी मंत्री बनवाना हो या अपने समर्थकों के साथ अपना संसदीय क्षेत्र छोड़ ग्वालियर के विकास कार्यों की समीक्षा बैठक करना हो।
सियासत के जानकार बताते है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को कांग्रेस से भाजपा में आए भले ही पांच साल का लंबा समय बीत गया हो लेकिन सिंधिया अब भी भाजपा में अपने को पूरी तरह एडजस्ट नहीं हो पाए है। यहीं कारण है कि सिंधिया जो कांग्रेस में रहते हुए पूरे प्रदेश में खासा सक्रिय नजर आते थे वह अब अपने संसदीय क्षेत्र गुना-शिवपुरी तक ही सीमित है। वहीं सिंधिया को लेकर उन्हीं के संसदीय क्षेत्र में आने वाले भाजपा विधायकों के लगातार आते बयान भी सिंधिया को लगातार असहज महसूस कर रहे है। पिछले दिनों भाजपा के मंडल अध्यक्ष का सिंधिया को लेकर बयान जिस तरह से वायरल हुआ वह भी यह बताता है कि सिंधिया को लेकर उन्हीं के संसदीय क्षेत्र में सब कुछ सामान्य नहीं है।
सियासत के जानकार बताते है कि ग्वालियर-चंबल की सियासत में सिंधिया घराने का लंबे समय से प्रभाव रहा है और आज भी ग्वालियर-चंबल में सिंधिया को महाराज से ही संबोधित किया जाता है। ऐसे में भाजपा के सियासी चाणक्य माने जाने वाले अमित शाह के द्वारा सिंधिया को राजा साहब बताना ग्वालियर-चंबल के साथ प्रदेश की सियासत में सिंधिया को एक पॉवर सेंटर के रूप में स्थापित करने की कोशिश है।