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मेरे सपने..
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शैफाली शर्मा मेरे सपने मुझे सोने नहीं देतेकभी रात की चादर पर पड़ीसलवटों से चुभते हैंतो कभी दिन के आसमान सेजलती धूप से बरसते हैंमैं अक्सर रातों में उठकरउन सलवटों को हटाता हूँऔर भरी दोपहरकाला चश्मा पहने निकलता हूँयदि रात एक करवट में निकाल भी लूँतो पीठ का दर्द बनकरदिन भर सताते हैंचश्मे से आँखें तो बचा लीलेकिन बालों में चाँदी से चमचमाते हैंएक छोटी कैंची से बालों में उग आए सपनों को काट लेता हूँआईने के सामने फिर से जवान हो जाता हूँपीठ का दर्द तो किसी को दिखाई नहीं देतासो अकेले ही सहन कर जाता हूँमेरे सपने जो मुझे सोने नहीं देतेनींद की गोली से उन्हें भगाता हूँवो जब तक चले नहीं जातेसोने का स्वांग रचता हूँवो जाते भी कहाँ हैंकभी दराज में पुराने खत की तरह फड़फड़ाते हैंतो कभी तकिए के कोने को गीला कर जाते हैंऔर जब दुनिया से दूरखुद को तन्हा पाता हूँतो मेरे सपने जो मुझे सोने नहीं देतेउन्हें अपने सिरहाने रखकर सो जाता हूँ।