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Written By DW
Last Modified: शनिवार, 16 मई 2026 (09:37 IST)

क्या अमेरिका के पास है ईरान का यूरेनियम हटाने का कोई प्लान?

माना जा रहा है कि ईरान के पास 440 किलो से ज्यादा संवर्धित यूरेनियम है, जिसका इस्तेमाल परमाणु हथियार बनाने में किया जा सकता है। डॉनल्ड ट्रंप ने वादा किया है कि वे परमाणु खतरे को पूरी तरह खत्म कर देंगे, लेकिन कैसे? देखिए।

US plan on Iran uranium
एरफान कासरेई | डार्को जानजेविच
 
ईरान का परमाणु कार्यक्रम दशकों से विवादों का कारण रहा है। आज कई ईरानी नागरिक ‘येलोकेक', ‘सेंट्रीफ्यूज' और ‘संवर्धन' जैसे शब्दों को संकट, अस्थिरता और युद्ध से जोड़कर देखते हैं। यूरेनियम संवर्धन पर सरकार की जिद के कारण देश पर कड़े प्रतिबंध लगे हैं। कुछ अनुमानों के मुताबिक, इससे देश को लगभग 3.5 ट्रिलियन डॉलर का सीधा आर्थिक नुकसान हुआ है।
 
ईरान और अमेरिका के बीच हालिया सैन्य संघर्षों और अस्थिर संघर्ष-विरामों के दौरान, परमाणु कार्यक्रम एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। अमेरिका का पूरा ध्यान विशेष रूप से ईरान के परमाणु भंडार पर है। माना जाता है कि ईरान के पास 440 किलोग्राम से अधिक ऐसा यूरेनियम है जो 60 फीसदी तक संवर्धित हो चुका है। नागरिक ऊर्जा जरूरतों, जैसे कि परमाणु संयंत्रों से बिजली उत्पादन के लिए इतनी शुद्धता की जरूरत नहीं होती है। सैद्धांतिक रूप से, इस सामग्री को बहुत कम समय में 90 फीसदी तक संवर्धित किया जा सकता है, जो परमाणु बम बनाने के लिए काफी है।

 

क्या अमेरिका और ईरान मिलकर ये काम करेंगे?

राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप इस यूरेनियम भंडार के लिए अक्सर ‘न्यूक्लियर डस्ट' शब्द का इस्तेमाल करते हैं। यह जून 2025 के उस सैन्य हमले की ओर इशारा है, जिसके बारे में ट्रंप का मानना है कि उन्होंने ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षमताओं को ‘जड़ से खत्म' कर दिया था।
 
ट्रंप ने बार-बार कहा है कि अमेरिका इस परमाणु सामग्री पर कब्जा कर लेगा, लेकिन यह कैसे किया जाएगा, इसके बारे में उन्होंने विरोधाभासी बयान भी दिए हैं। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका ‘ईरान के साथ मिलकर ढेर सारी खुदाई मशीनों के साथ' मलबे के नीचे से इसे खोदकर निकालेगा, शायद किसी शांति समझौते के बाद। अप्रैल में, ट्रंप ने कहा था कि ईरान अपना भंडार सौंपने को तैयार है, जबकि पिछले हफ्ते उन्होंने संकेत दिया कि अमेरिका को ‘नुकसान उठाना' पड़ सकता है क्योंकि ‘परमाणु हथियार लेने के लिए हमें ईरान तक का सफर तय करना होगा।'
 
ईरान ने अभी तक यूरेनियम भंडार से संबंधित किसी भी समझौते की पुष्टि नहीं की है। मार्च में अमेरिकी ब्रॉडकास्टर ‘सीबीएस' से बात करते हुए, ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि पिछले साल के हमले के बाद यह सामग्री अभी भी मलबे के नीचे दबी हुई है। ईरान के पास इसे बाहर निकालने का ‘कोई कार्यक्रम' या ‘कोई योजना' नहीं है। हालांकि, अराघची ने इस बात का भी ध्यान रखा कि भविष्य में अमेरिका के साथ किसी समझौते के तहत अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम की ‘गुणवत्ता कम करने' की संभावना को पूरी तरह खारिज न किया जाए।
 

ईरान के परमाणु भंडार का ठिकाना स्पष्ट नहीं

हालिया मीडिया रिपोर्टों से यह भी संकेत मिले हैं कि ईरान अपने भंडार के एक हिस्से की ‘गुणवत्ता कम करने' और बाकी बचे हिस्से को किसी तीसरे देश को सौंपने के लिए तैयार था। इसी बीच, पिछले हफ्ते के आखिर में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा कि उनका देश ईरान के संवर्धित यूरेनियम को सुरक्षित रखने के लिए तैयार है। हालांकि, अभी भी यह स्पष्ट नहीं है कि यह सामग्री असल में कहां रखी हुई है। इसे हासिल करने के लिए किन तकनीकी चुनौतियों को दूर करने की जरूरत होगी।
 
ईरान के तीन प्रमुख परमाणु केंद्र इस्फहान, फोर्डो और नतांज पिछले साल हुए ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर' के दौरान भारी नुकसान झेल चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के महानिदेशक राफेल ग्रॉसी ने अप्रैल 2026 के आखिर में कहा था कि ईरान का अधिकांश अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम संभवतः अभी भी इस्फहान परमाणु परिसर में ही मौजूद है। उनके मुताबिक, नीले रंग के 18 कंटेनर में लगभग 200 किलोग्राम संवर्धित यूरेनियम होने का अनुमान था, जो 9 जून 2025 को इस्फहान परमाणु प्रौद्योगिकी केंद्र की एक सुरंग में ले जाए गए थे। यह घटना 12 दिवसीय युद्ध शुरू होने से ठीक चार दिन पहले की है।
 
हालांकि, परमाणु भंडार को लेकर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। ऐसी अटकलें भी लगाई जा रही हैं कि यह सामग्री अब फोर्डो या ईरान के बुशेहर परमाणु ऊर्जा संयंत्र में जमा कर के रखी गई है।
 
ईरान ने संकेत दिया है कि वह केवल अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) की देखरेख में ही इस सामग्री को वापस निकालेगा। मेडिकल फिजिक्स और रेडिएशन सुरक्षा के विशेषज्ञ रोलैंड वोल्फ ने कहा, "ईरान से इस सामग्री को हटाना तकनीकी रूप से असंभव नहीं है, लेकिन यह कई अन्य बातों पर भी निर्भर करता है। आईएईए की कड़ी निगरानी में, इस सामग्री को एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है और देश से बाहर पहुंचाया जा सकता है।” वह आगे बताते हैं, "इसके लिए विशेष सुरक्षा उपायों का पालन करना होगा। चूंकि ईरान संवर्धित यूरेनियम को फोर्डो जैसे भूमिगत स्थानों पर जमा करके रखता है। इसलिए, वहां तक पहुंचने और सामग्री को सुरक्षित बाहर निकालने का काम तकनीकी और भौतिक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है।”
 

क्या लीबिया एक रोल मॉडल बन सकता है?

ईरान से 440 किलोग्राम से अधिक संवर्धित यूरेनियम को हटाने में शामिल तकनीकी चुनौतियां इस पूरी समस्या का केवल एक पहलू हैं। सुरक्षा से जुड़े मुद्दे शायद ज्यादा अहमियत रखेंगे।
 
संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के पूर्व राजदूत रहे जॉन बोल्टन ने ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के तौर पर काम किया था। उन्होंने 2000 के दशक की शुरुआत में लीबिया के परमाणु हथियार कार्यक्रम को खत्म किए जाने का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि वह कार्यक्रम ‘काफी छोटा' था। 2003 और 2004 में परमाणु सामग्री को हटाने की पहल किसी संघर्ष के बीच नहीं, बल्कि एक ‘अनुकूल माहौल' में हुई थी।
 
बोल्टन ने डीडब्ल्यू को बताया, "अमेरिका और ब्रिटेन के अधिकारी लीबिया गए। उन्होंने सब कुछ पैक किया और उसे ओक रिज, टेनेसी ले आए, जहां वह आज भी मौजूद है। मुझे लगता है कि हम ईरान के कार्यक्रम के साथ भी ऐसा ही कुछ कर सकते हैं, बशर्ते वहां का माहौल अनुकूल हो, लेकिन इसमें बहुत अधिक समय लगेगा क्योंकि ईरान का कार्यक्रम काफी आगे बढ़ चुका है। बतौर बोल्टन, "सबसे जरूरी बात यह है कि अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम या कार्यक्रम के अन्य पहलुओं को आतंकवादियों या अन्य ‘दुष्ट देशों' के हाथों में न पड़ने दिया जाए।”
 

बोल्टन ने ईरान के शासन की विचारधारा को 'कट्टर' बताया

बोल्टन ने डीडब्ल्यू को यह भी बताया कि जब तक ईरान में अयातोल्लाहों की सत्ता और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स का वर्चस्व है, तब तक परमाणु खतरे को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार, ईरान के परमाणु हथियारों के सपने को स्थायी रूप से रोकने के लिए वहां के शासन को जड़ से उखाड़ना ही एकमात्र विकल्प है।
 
वह कहते हैं, "उनकी विचारधारा कट्टरपंथी है। इस्लामिक समुदाय के भीतर अपना दबदबा बनाने तथा भौगोलिक रूप से मध्य-पूर्व में अपना वर्चस्व स्थापित करने की आकांक्षाओं पर आधारित है। वे अस्थायी रूप से रियायतें दे सकते हैं। मुझे उन पर भरोसा नहीं है कि वे लंबे समय तक अपने वादों पर टिके रहेंगे, लेकिन ऐसा लग रहा है कि हम उसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।”
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