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जरूरतमंदों की मदद की अनोखी पहल

जरूरतमंदों की मदद की अनोखी पहल
लिफी थॉमस
6 अगस्त 2008, चेन्न
WDWD
नागपुर की पुष्पा नामक महिला को अपनी दुकान में बेहतर व्यवस्था के लिए 5000 रूपए के लोन की जरूरत थी। अपनी आय की पूर्ति के लिए उसने सिक्के वाला सार्वजनिक टेलीफोन अपनी दुकान पर रखा। साथ ही सिलाई का काम भी शुरु किया। वह आने वाले समय में अपनी दुकान में किराने का सामान रखना भी शुरू करना चाहती थी

टेक्सस् इंस्ट्रूमेंट्स के समर्थ नामक व्यक्ति को माइक्रो-लेंडिंग का विचार पसंद आया और उसने लघु उद्यमी पुष्पा को एक साल के लिए 1000 रूपए का लोन देने का निर्णय लिया। इस लोन की ब्याज दर 3.5 प्रतिशत तय की गई।

समर्थ और पुष्पा के बीच पुल का काम किया माइक्रो-लेंडिंग संस्था ने जिसका नाम है ‘रंग द’। रंग दे की मदद से समर्थ अपनी सामाजिक जिम्मेदारी पूरी कर पाया और पुष्पा के लिए आर्थिक स्वतंत्रता की राह खुल गई। ‘रंग द’ भारत की पहली ऑनलाइन माइक्रो लेंडिंग की वेब साइट है जिसका निर्माण राम एन.के और स्मिता राम ने किया है
  अब तक ‘रंग दे’ ने महाराष्ट्र और तमिलनाडू के लगभग 56 लघु उद्यमियों की मदद की है और 38 निवेशकों ने उनका साथ दिया। इस कार्य को आगे बढ़ाने के लिए और भी कई योजनाएँ हैं। ‘रंग दे’ को उम्मीद है कि तीसरा साल और भी अच्छा रहेगा।      

इंटरनेट के माध्यम से यह साइट बहुत से निवेशकों और जरूरतमंद उद्यमियों के लिए एक नई दिशा का काम करेगी। इस परमार्थिक संस्था के जरिये बहुत से लघु उद्यमियों की सहायता हो पाएगी।
इसे बनाने का निर्णय दिसंबर 2006 में लिया गया। गणतंत्र दिवस के दिन पहली बार इस वेब साइट को डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू पर लाँच किया गया। राम एन.के और स्मिता राम हमेशा से ही समाज के विकास के लिए कार्यरत रहे हैं। उनका कहना है कि इस वेब साइट को वो राष्ट्रीय स्तर पर लाँच करना चाहते थे।

राम के अनुसार -’ हमने कुछ बेंच मार्क भी इसके लिए बनाए थे। हम चाहते थे कि यह भारतीय रहे, लोग इसको देखकर कुछ कदम भी उठाएँ ना कि सिर्फ लिखकर छोड़ दें।‘
राम एक सॉफ्टवेयर कंसल्टेंट हैं और बहुत सी कंपनियों के साथ काम कर चुके हैं । जिसमें सत्यम कंप्यूटर भी शामिल है। स्मिता के सामाजिक कार्यों के अनुभव और राम के सॉफ्टवेयर डेवेलप्मेंट के अनुभव से यह मुमकिन हो पाया है

राम ने कहा - ’ इसके लिए सबसे पहले उन्होंने डोमेन नेम ’ रंग दे(शेयरिंग एंड स्प्रेडिंग द कलर्स ऑफ जॉय) ’ को रजिस्टर करवाने का निर्णय लिया।‘’ यह नाम राम के द्वारा ही दिया गया था। स्मिता के अनुसार - सितंबर 2007 में उन्होने ‘रंग द’ को अपना पूरा समय देने के लिए नौकरी छोड़ दी। बहुत से लोग इससे जुड़े और अपना समय इसे दिया और इस तरह शुरूआत हुई ‘रंग द’ की।

नियती टेक्नोलोजिस को अपने पार्टनर के रूप में पाना एक बड़ी उपलब्धि थी। इस फर्म ने ‘ रंग द’ के परमार्थिक कार्य के लिए 50 प्रतिशत की छूट दी।राम जब भारत में आयोजित दो दिवसीय कॉन्फ्रेन्स के लिए आए, तो यहाँ आकर उनका उत्साह और बढ़ गया।यहाँ उन्हें बहुत लोगों से इक्विटी के प्रस्ताव भी मिले।उन्हें आईसीआईसीआई फॉउन्डेशन की तरफ से एक साल के लिए इस कार्य को संचालित करने के लिए सहायता भी मिली

अब तक ‘रंग द’ ने महाराष्ट्र और तमिलनाडू के लगभग 56 लघु उद्यमियों की मदद की है और 38 निवेशकों ने उनका साथ दिया। इस कार्य को आगे बढ़ाने के लिए और भी कई योजनाएँ हैं। ‘रंग द’ को उम्मीद है कि तीसरा साल और भी अच्छा रहेगा।