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Last Updated : सोमवार, 19 जनवरी 2026 (18:14 IST)

नोबेल विवाद से ग्रीनलैंड पर कब्जे तक, डोनाल्ड ट्रंप का वो पत्र जिसने हिला दी दुनिया

डोनाल्ड ट्रंप का नॉर्वे के पीएम को खत
Trump wrote a letter to Norwegian Prime Minister: डोनाल्ड ट्रंप का गुस्सा अब सातवें आसमान पर है। नोबेल शांति पुरस्कार न मिलने से नाराज ट्रंप ने नॉर्वे के पीएम को दो टूक कह दिया है कि अब वह 'केवल शांति' के बंधन में नहीं बंधे हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने ग्रीनलैंड के मालिकाना हक पर भी सवाल उठाकर पूरी दुनिया को चौंका दिया है। जानिए ट्रंप के इस नए 'मिशन' के पीछे की पूरी कहानी।
 
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और नोबेल शांति पुरस्कार के बीच का 'अधूरा इश्क' अब एक नए विवाद में बदल गया है। भले ही इस बार की नोबेल विजेता मारिया मचाडो ने अपना पदक ट्रंप को सौंप दिया हो, लेकिन ट्रंप का दिल अभी भी नॉर्वे की नोबेल समिति से खफा है। ट्रंप ने नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोरे को एक ऐसा पत्र लिखा है, जिसने कूटनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है।
 

ट्रंप की दो टूक, मैंने 8 से ज्यादा युद्ध रोके, लेकिन... 

ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा कि मैंने 8 से ज्यादा युद्ध रोके, फिर भी आपके देश ने मुझे नोबेल नहीं दिया। इसलिए अब मैं 'केवल शांति' के बारे में सोचने के लिए बाध्य नहीं हूं। हालांकि शांति अच्छी बात है, पर अब मेरी प्राथमिकता सिर्फ वही होगा जो अमेरिका के लिए सही है। ट्रंप यहीं नहीं रुके। उन्होंने डेनमार्क और ग्रीनलैंड के मुद्दे को फिर से गरमा दिया है। ट्रंप का कहना है कि डेनमार्क के पास ग्रीनलैंड के मालिकाना हक का कोई ठोस लिखित दस्तावेज नहीं है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि सिर्फ इसलिए कि सैकड़ों साल पहले उनकी एक नाव वहां रुक गई थी, वो मालिक बन गए? हमारी भी सैकड़ों नावें वहां उतरी थीं। ट्रंप के अनुसार, डेनमार्क अकेले रूस और चीन जैसी महाशक्तियों से ग्रीनलैंड को नहीं बचा सकता।

नाटो को लेकर सख्त हुए ट्रंप 

नाटो (NATO) को लेकर ट्रंप का रुख और सख्त हो गया है। उनका दावा है कि अमेरिका ने दशकों तक नाटो को पाला है, अब नाटो की बारी है कि वह अमेरिका के लिए कुछ करे। ट्रंप का सीधा संदेश है कि जब तक ग्रीनलैंड अमेरिका के पूर्ण नियंत्रण में नहीं आता, दुनिया सुरक्षित नहीं रहेगी। यह पत्र दिखाता है कि ट्रंप अपनी 'अमेरिका फर्स्ट' नीति को अब एक नए और आक्रामक स्तर पर ले जा रहे हैं, जहां पुरस्कारों से ज्यादा महत्व अब रणनीतिक विस्तार को दिया जा रहा है।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala 
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