जानिए महाकुंभ की पौराणिक कथाएं

समुद्र-मंथन की कथा :-

व्यापक रूप से अमृत- मंथन की उस कथा को अधिक महत्व दिया जाता है जिसमें स्वयं विष्णु मोहिनी रूप धारण करके असुरों को छल से पराजित करते हैं। गरुड़ का संदर्भ भी स्मरणीय है, परन्तु कुल मिलाकर विशेष प्रसिद्धि समुद्र-मंथन की कथा को ही मिली।

दुर्वासा की कथा में भी समुद्र-मंथन का प्रसंग समाहित है। इसलिए भी उनका मूल्य बढ़ जाता है। कश्यप की संततियों का पारम्परिक युद्ध देवासुर-संग्राम जैसा प्रभावी रूप ग्रहण नहीं कर सका यद्यपि उसकी प्राचीनता संदिग्ध नहीं है। गरुड़ की महत्ता विष्णु से जुड़ गई और वासुकि रूप में नागों का संबंध शिव से अधिक माना गया। यहाँ भी शैव-वैष्णव भाव देखा जा सकता है, जो बड़े द्वन्द्वात्मक संघर्ष के बाद अंततः हरिहरात्मक ऐक्य ग्रहण कर लेता है।
समुद्र-मंथन और अमृत-कुंभ : समुद्र-मंथन एक ऐसी कथा है जिसके पौराणिक रूप के भीतर जीवन का रहस्य निहित है। उसे सृष्टि-कथा से भिन्न दार्शनिक स्तर पर तत्व कथा कहा जा सकता है। सहस्त्र वर्षों के सुदीर्घ अनुभव को अद्भुत प्रतीकात्मक भाषा प्रदान की गई है, जिसमें द्वन्द्व और संघर्ष की कठोर भूमिका अपनाई गई है।

उसमें मनोगत यथार्थ का शाश्वत रूप भी प्रतिबिम्बित हुआ है। यह कथा महाभारत के अन्तर्गत अध्याय सत्रह और अठारह में दी गई है तथा अनेक पुराण ग्रंथों में वर्णित है। पुराणों की तुलना में महाभारत ने इसके निहितार्थ को आध्यात्मिक रूप दे दिया है।



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