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हे ईश्वर, तू कहाँ है
हे ईश्वर, तू कहाँ है ढूंढती हूँ तुझे पहाड़ों, कंदराओं में कहते है तू बसता है मन के भावों में पुष्प, गंध, धूप क्या करू तुझे अर्पित? खुश है तू अंजुली भर जल में तुझमें मुझमें दूरी है कितनी? मीलों के फासले है या है समझ अधूरी क्या तू सचमुच बसा है पाषाण प्रतिमाओं में? या तू बसा है दिल की गहराईयों में आखिर कब होगा तेरा मेरा साक्षात्कार? मिलों मुझसे पूछने है तुमसे कई सवालअब मन के इस अंधकार को दूर भगाओं हे ईश्वर जहाँ भी हो अब तो नजर आओ।
लेखक के बारे में
गायत्री शर्मा