सूना है घर, तुम्हारे बिन
-ललित भारद्वाज
मैंने बनाया हैतुम्हारे लिएतुम्हारे मन की सुकोमल सी भावनाओं के अनुरूपएक सुंदर सा छोटा घर।मैंने इस घर को बनाने मेंसीमेंट, मिट्टी, ईंट व सरियों की जगहहाढ़-मांस, दिल-दिमाग तथारक्त कोशिकाओं का सम्मिश्रण किया है।मुझ द्वारा बनाया हुआयह तुम्हारा घरइतना मजबूत घर हैकि जब तक मेरी अंतिम सांस मेरे साथ हैतब तक तुम्हारे लिए बना हुआयह तुम्हारा घरकभी भी टूट नहीं सकता।यद्यपियह घर मैंने तुम्हारे लिए बना तो लियालेकिन जब तक तुम इस घर में नहीं आ जातीतब तक मुझ द्वारा बनाया हुआतुम्हारे लिएतुम्हारा यह घरसूना सा ही पड़ा रहता है, कभी-कभी मकडि़यां इसमें जाले बना लेती हैं,कभी-कभी धूलभरी तेज आंधियांअपनी धूल से इसे गंदा कर देती हैं,कभी-कभी तो कुछ चलते-फिरते उड़ते परिंदे भीइस घर में घुसकरतिनकों से अपनाघरौंदा बना लेने का प्रयास कर बैठते हैं।कैसे करूं मैं तुम्हारे घर की देखरेख,मुझे और भी तो कई काम रहते हैं।बार-बारमुझे तुम्हारे घर कीसाफ-सफाई करनी पड़ती है।मुझसे नहीं होती अब बार-बारतुम्हारे घर की देख-रेख।चूंकितुम्हारे घर की शोभा तोतुम ही से तो हैतो फिरअपना स्वयं का घरसंभाल लेने में इतनी देर क्यों?...
जब इस घर का मालिकाना अधिकार भीतुम्हारे ही नाम से हैतो फिर अपने स्वयं के घर कोसंभालने में इतना असमंजस क्यों?मुझे तुमसे यह शिकवा नहींकि तुम स्वयं का घर छोड़कर कहां रहती होलेकिनतुम अपने घर को ढूंढने का प्रयास तो करोतुम्हें तुम्हारे घर को ढूंढने मेंदिक्कत बिल्कुल नहीं आएगीक्योंकिमैं तो बस इतना ही जानता हूंऔर इस बात को यकीन से कहता भी हूं किमुझ द्वारा बनाए हुएतुम्हारे लिएतुम्हारे प्यारे से घर कीसौंधी सी खुशबू हमेशा तुम्हें अहसास कराती रहेगीकिमुझ द्वारा बनाया हुआयह घरतुम्हारा ही हैतुम्हारे घर में न आले हैं............
न दीवट हैं............
न झरोखे हैं............
न िखड़कियां हैं............
न दरवाजे हैं ............
और न दहलीजें हैंतुम्हारा घर तो खुला विशाल आंगन है........................
आ जाओ............आ जाओक्योंकि............आज तक............अभी तक............ सूना है तुम्हारा घर तुम्हारे बिन।