रोहिणी तप रही है
काव्य-संसार
मुरलीधर चाँदनीवाला वर्षा के लिए चल रहा है अनुष्ठानचिंता मत करोन करो हाहाकारवर्षा के लिए ही निर्जला व्रत मेंधरती खप रही हैधीरज रखो, तुम्हारे लिए हीरोहिणी तप रही है।पर्वत खड़े हैं भुजाएँ फैलाकर
मिट्टी गूँथ रही हैं स्वप्नमालाएँरोम-रोम पुलकित हो उठेगाउतरेंगी जब पर्जन्य ऋचाएँप्रकृति वर्षा के निमित्त हीमाला जप रही है धीरज रखो, तुम्हारे लिए हीरोहिणी तप रही है।यज्ञ सफल नहीं होता तप के बिनपसीना ही लाता है आषाढ़ का पहला दिनसूरज की कविताएँधूप में छप रही हैंधीरज रखो, तुम्हारे लिए हीरोहिणी तप रही है।