चांद, तुम कहां रहे सारी रात
- संजय कोटिया
कल रात जब ख्वाब में आया चांद,अर्से बाद,मैंने उसे बांहों में समेटकर उलाहना दिया, तुम कहां रहेइतनी रात?मेरी आंखें सन्नाटे भरेंतकती रही राहेंतुम्हारे लिए,मुख़्तसर सी हंसी लिएचांद ने कहा, टूटे नहीं ख्वाबों से मरासिम तुम्हारे, वो रोशन नहीं हो सके क्योंकि मुझे कैद कर लिया था किसी मां ने थाली में बच्चे को बहलाने के लिए...