कम लगता है जीवन-अर्पण
-प्रियंका पांडेय
अथाह हो तुम,
सागर से विशाल... तुम अविचल, अखंड हो ढाल ;
प्रभु-स्वरूप करते हो जीवन खुशहाल... करने को तुम्हारा अभिनंदन बार-बार करता है ये मन तुम्हारे इस अंश को
कम लगता है जीवन-अर्पण;
याद आता है मुझको,
तुम्हारी छाँव के नीचे
करता क्रंदन मेरा बचपन, बचपन को भरता अपनी बाहों, प्रेम भरा वह आलिंगन,
सिमटी जिसमें गुड़िया बन मैं,
करती खुद पर अभिमान ;
हे तात !
तुम्हें जब करती याद,
मन में छाता साहस अपार;
तुमको जो करना चाहूँ अर्पण, सच ही लगता सारा जीवन कम...
अथाह हो तुम,
सागर से विशाल... तुम अविचल, अखंड हो ढाल ;
प्रभु-स्वरूप करते हो जीवन खुशहाल... करने को तुम्हारा अभिनंदन बार-बार करता है ये मन तुम्हारे इस अंश को
कम लगता है जीवन-अर्पण;
याद आता है मुझको,
तुम्हारी छाँव के नीचे
करता क्रंदन मेरा बचपन, बचपन को भरता अपनी बाहों, प्रेम भरा वह आलिंगन,
सिमटी जिसमें गुड़िया बन मैं,
करती खुद पर अभिमान ;
हे तात !
तुम्हें जब करती याद,
मन में छाता साहस अपार;
तुमको जो करना चाहूँ अर्पण, सच ही लगता सारा जीवन कम...

