आंखों का पर्दा
-ममता किरण
घर में लगेरंग-बिरंगे खूबसूरत पर्दे...कितने अच्छे लगते हैं...एक से एक महंगेऔर साधारण भीपर्दे चाहे किसी भी तरह के होंसजा ही देते हैं घर कोयूं देखा जाएतो कितना कुछ देते हैं ये पर्देलोगों के बीच दूरियांभले ही बढ़ रही होंपरकम जगह में भीकितनी सारी जगह बना देता हैएक पर्दा...अद्भुत है पर्दाइसी सिलसिले में याद आता हैयशपाल की कहानी का'
टाट का पर्दा'जिसने छुपा रखी थीअभावों से जूझती एक पूरी दुनियासच, ये पर्दे छुपा देते हैंहमारे अभाव, हमारे संघर्ष...बढ़ा देते है हमारी शानपर अबबदल गया हैपर्दे का चरित्रपर्दे की आड़ मेंशानदार लोग घूस लेते हैंभ्रष्टाचार करते हैंऐसे जलील सौदे करते हैंकि झुक जाएंशर्म से आंखेंपर कहां...अब तो आंखों का पर्दा भी नहीं बचा...!