अब मन पतंगों-सा नहीं उड़ता
फाल्गुनी
हमारे रिश्ते में 'गुड़' रहा नहीं, '
तिल' भर प्यार बचा नहीं, और अब तो पतंगों-सा मन भी नहीं उड़ता तुम्हारी आवाज के लिए फिर भी संक्रांति शुभ और शालीन हो तुम्हारे लिए। मेरे मन के आकाश मेंतुम्हारी भावनाओं का सूर्य उत्तरायण हो, यह अब संभव नहीं और तुम्हारे मन के मैदान में मेरी खुशियों की गिल्ली उछल जाए यह भी तो एक सपना ही है।
लेखक के बारे में
स्मृति आदित्य