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हिन्दी कविता : बंदूकें

हिन्दी कविता
तुम्हें
भले ही भाती हों
अपने खेतों में खड़ी
बंदूकों की फसल
लेकिन -
मुझे आनंदित करती है
पीली-पीली सरसों
और दूर तक लहलहाती
गेहूं की बालियों से उपजता
संगीत।
 
तुम्हारे बच्चों को
शायद
लोरियों-सा सुख भी देती होगी
गोलियों की तड़तड़ाहट
लेकिन सुनो...
कभी खाली पेट नहीं भरा करतीं
बंदूकें,
सिर्फ कोख उजाड़ती हैं।
लेखक के बारे में
सुबोध श्रीवास्तव
परिचय : जन्म- 4 सितंबर 1966, शिक्षा- परास्नातक। 'आज' (हिन्दी दैनिक), कानपुर में कार्यरत। कई पुस्तकों का प्रकाशन, देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। दूरदर्शन, आकाशवाणी से प्रसारण। गणेश शंकर विद्यार्थी अतिविशिष्ट सम्मान प्राप्त तथा 'काव्ययुग' ई-पत्रिका का संपादन।.... और पढ़ें