जानिए हिन्दी सेवी विदेशी विद्वान

फादर कामिल बुल्के-(बेल्जियम)-

फादर कामिल बुल्के एक ऐसे विद्वान थे जो भारतीय संस्कृति और हिन्दी से जीवन भर प्यार करते रहे। फादर कामिल बुल्के हिन्दी के एक ऐसे समर्पित सेवक रहे,जिसकी मिसाल दी जाती है। 1909 में बेल्जियम में जन्में फादर कामिल बुल्के ने अपने युवा दिनों में संन्यासी बनने का फैसला करके भारत की तरफ रुख किया और झारखंड के रांची में आकर एक स्कूल में पढ़ाने लगे। खुद इंजिनियरिंग के स्टूडेंट रहे कामिल बुल्के को भारत में बोली से ऐसा लगाव हुआ कि उन्होंने न सिर्फ हिन्दी ,बल्कि ब्रज,अवधी और संस्कृत भी सीखी।


इन भाषाओं को भारतीय विश्वविद्यालयों में सीखने और उनमें मानक डिग्रियां हासिल करने के दरम्यान उन्हें राम नाम की ऐसी लगन लगी कि उन्होंने राम कथा की उत्पत्ति पर सबसे प्रामाणिक शोध किया। बुल्के का यह हिन्दप्रेम ही था कि शोध के दौरान उन्होंने अपनी पीएचडी थीसिस हिन्दमें ही लिखी। जिस समय वे इलाहाबाद में शोध कर रहे थे उस समय देश में सभी विषयों की थीसिस अंग्रेजी में ही लिखी जाती थी। उन्होंने जब हिन्दी में थीसिस लिखने की अनुमति मांगी तो विश्वविद्यालय ने अपने शोध संबंधी नियमों में बदलाव लाकर उनकी बात मान ली। उसके बाद देश के अन्य हिस्सों में भी हिन्दमें थीसिस लिखी जाने लगी।

बाद में वह सेंट जेवियर कॉलेज,रांची में हिन्दी और संस्कृत के विभागाध्यक्ष भी रहे। कामिल बुल्के का एक और महत्वपूर्ण काम हिन्दी-अंग्रेजी शब्दकोश की तैयारी थी,जिसे उन्होंने उम्र भर बहुत जतन से बढ़ाया। बाद के दिनों में वह चर्च में पुजारी बने और उनके नाम के आगे फादर लगा। भारत में उन्होंने बाइबल का हिन्दअनुवाद भी पेश किया।

उन्होंने लिखा भी है, 'ईश्वर का धन्यवाद, जिसने मुझे भारत भेजा और भारत के प्रति धन्यवाद,जिसने मुझे इतने प्रेम से अपनाया। 7 अगस्त 1982 को फादर बुल्के का निधन हो गया। हिन्दी सेवा के लिए उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक 'पद्मभूषण'से सम्मानित किया गया।
अगले पेज पर : डॉ.जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन



और भी पढ़ें :