रमजानुलमुबारक
नेकियों का मौसमे बहार
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नोमान अली 'मासूम'माहे रमजान को नेकियों का मौसमे बहार कहा गया है। जिस तरह मौसमे बहार में हर तरफ सब्जा ही सब्जा नजर आता है। हर तरफ रंग-बिरंगे फूल नजर आते हैं। इसी तरह रमजान में भी नेकियों पर बहार आई होती है। जो शख्स आम दिनों में इबादतों से दूर होता है, वह भी रमजान में इबादतगुजार बन जाता है। यह सब्र का महीना है और सब्र का बदला जन्नात है। यह महीना समाज के गरीब और जरूरतमंद बंदों के साथ हमदर्दी का महीना है। इस महीने में रोजादार को इफ्तार कराने वाले के गुनाह माफ हो जाते हैं। पैगम्बर मोहम्मद सल्ल. से आपके किसीसहाबी (साथी) ने पूछा- अगर हममें से किसी के पास इतनी गुंजाइश न हो तो एक खजूर या पानी से ही इफ्तार करा दिया जाए। यह महीना मुस्तहिक लोगों की मदद करने का महीना है। रमजान के तअल्लुक से हमें बेशुमार हदीसें मिलती हैं और हम पढ़ते और सुनते रहते हैं लेकिन क्या हम इस पर अमल भी करते हैं। ईमानदारी के साथ हम अपना जायजा लें कि क्या वाकई हम लोग मोहताजों और नादार लोगों की वैसी ही मदद करते हैं जैसी करनी चाहिए? सिर्फ सदकए फित्र देकर हम यह समझते हैं कि हमने अपना हक अदा कर दिया है।जब अल्लाह की राह में देने की बात आती है तो हमारी जेबों से सिर्फ चंद रुपए निकलते हैं, लेकिन जब हम अपनी शॉपिंग के लिए बाजार जाते हैं वहाँ हजारों खर्च कर देते हैं। कोई जरूरतमंद अगर हमारे पास आता है तो उस वक्त हमको अपनी कई जरूरतें याद आ जाती हैं। यह लेना है, वह लेना है, घर में इस चीज की कमी है। बस हमारी ख्वाहिशें खत्म होने का नाम ही नहीं लेती हैं। खासतौर से हमारी बहनें ईद की शॉपिंग का जायजा लें कि वह अपने लिबास पर कितना कुछ खर्च करती हैं। जरा रुक कर सोचें हममें से कई जरूरतमंद लोग दुनिया में मौजूद हैं जिनके पास तन ढँकने के लिए कपड़ा मौजूद नहीं। अगर इस महीने में हम अपनी जरूरतों और ख्वाहिशों को कुछ कम कर लें और यही रकम जरूरतमंदों को दें तो यह हमारे लिए बेहत अज्र और सिले का बाइस होगा। क्योंकि इस महीने में की गई एक नेकी का अज्र कई गुना बढ़ाकर अल्लाह की तरफ से अता होता है। मोहम्मद सल्ल ने फरमाया है जो शख्स नमाज के रोजे ईमान और एहतेसाब (अपने जायजे के साथ) रखे उसके सब पिछले गुनाह माफ कर दिए जाएँगे। रोजा हमें जब्ते नफ्स (खुद पर काबू रखने) की तरबियत देता है। हममें परहेजगारी पैदा करता है। लेकिन अब जैसे ही माहे रमजान आने वाला होता है, लोगों के जहन में तरह-तरह के चटपटे और मजेदार खाने का तसव्वुर आ जाता है। हमारे गैर मुस्लिम भाई तो इस इबादत के महीने को जिसमें खूब किस्म-किस्म के खाने बनाने और खाने वाला त्योहार मानते हैं।
रमजान दरअसल नेकियों का महीना है। अल्लाह से तअल्लुक का महीना है लेकिन हम नेकियों में आगे बढ़ने की फिक्र तो करते नहीं, बल्कि रमजान से पहले हमारे घरों में खूब खाने-पीने का सामान जमा होना शुरू हो जाता है और ज्यादा वक्त इस फिक्र में गुजरता है कि इफ्तार में आज क्या बनेगा। सेहरी किस चीज से होगी। मोहम्मद सल्ल. ने एक शख्स को डकार लेते हुए सुना तो फरमाया, अपनी डकार को कम कर इसलिए कि कयामत के दिन सबसे बढ़कर भूखा वह शख्स होगा जो दुनिया में खूब पेट भरकर खाता है। रोजा आदमी को यह सबक देता है कि वह शिकम परवरी (खूब पेट भरकर खाना) को जिंदगी का असल मकसद न समझे। जिंदगी इससे कहीं ज्यादा है। हदीस में है कि इस महीने का इब्तेदाई हिस्सा रहमत है। दर्मियानी हिस्सा मगफिरत और आखिरी हिस्सा जहन्नाुम की आग से रिहाई और निजात का है। इस मुबारक महीने का एक-एक लम्हा कीमती है लेकिन आलम यह है कि अक्सर बेकार की गुफ्तगू में वक्त गुजारा जाता है। हद सेज्यादा सोना या फिर टीवी देखने में वक्त गुजारना, जबकि रोजे का असल मकसद अल्लाह का डर और परहेजगारी है। इस माहे मुबारक में खास रात आती है जिसे लैलतुल कद्र (जागने की बड़ी रात) कहते हैं। यह रात और इसमें शौक और जज्बे से की जाने वाली इबादत हजारों महीने की इबादत से अफजल और बेहतर है। इसी मुकद्दस रात में तमाम इंसानों की हिदायत के लिए आसमान से कुरआन उतरना शुरू हुआ, लेकिन बेहद अफसोसनाक बात है कि इस रात की बरकतों से फायदा उठाने की बजाय हमारा ज्यादा वक्त घर की सफाई, सफेदी या फिर ईद की शॉपिंग और लिबासों की तैयारियों में लगता है। बाजारों में जा बजा औरतों की भीड़ नजर आती है। क्या बच्चे, क्या बड़े साइकलों और स्कूटरों पर शहर की मस्जिदों की रोशनियों और सजावटों का लुत्फ लेने को हर तरफ घूमते-फिरते नजर आते हैं। चायखाने आबाद होते हैं। इस तरह यह इबादत की मुकद्दस रात मेले-ठेले की रात बनकर रह जाती है।
रमजान की चंद हिदायतें* ईद की तमाम शॉपिंग रमजान से पहले ही मुकम्मल कर लें। * घर की पुताई पहले ही कर लें ताकि ज्यादा वक्त इबादत में गुजरे। * कुछ चीजें बनाकर पहले ही फ्रीज में रख लें। इससे किचन का वक्त बच जाएगा। * सेहरी से कुछ देर पहले जाग जाएँ ताकि तहज्जुद की नमाज पढ़ सकें। * इफ्तार में कोई एक डिश बनाएँ। इफ्तार से पहले दुआएँ करें। * अपने खाने-पीने और लिबास पर कम खर्च करें। मजबूरों और खासकर उन बंदों की मदद करें जो शर्मो-गैरत की वजह से किसी के सामने हाथ नहीं फैलाते। * अपने माल की जकात हिसाब-किताब और कारोबार का जायजा लेते हुए ईमानदारी के साथ निकालें। जकात को टैक्स न समझें बल्कि यह मालदारों के ऊपर अल्लाह के जरूरतमंद बंदों का हक है। जकात की चोरी तमाम इबादतों और नेकियों को निगल जाती है। * लड़ाई-झगड़ों से दूर रहें और कोई आमादा हो तो उसे कहें- मैं रोजादार हूँ। * अपने हमवतनों के साथ भाईचारे का सुलूक करें। उनकी जान, माल और आबरू आपके हाथों मेहफूज रहे। आपका किरदार इस्लाम का चलता-फिरता नमूना दिखाई दे। उन लोगों के साए से भी बचें जो मजहब के नाम पर दहशतगर्दी और गंदी सियासत का बाजार गर्म करके इंसानी खून से होली खेल रहे हैं। अपने हमवतन भाइयों तक इस्लाम का पैगाम कुरआन और इस्लामी लिट्रेचर की शक्ल में पहुँचाएँ ताकि उन्हें भी इस्लाम का सही ज्ञान प्राप्त हो।