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Written By ND

दिलों को जो़ड़ने का खूबसूरत जरिया

'नमाज' 'रोजा'
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-हाशिम अली 'आसिफ'

रमजान अल्लाह तबारक व तआला की तरफ से ईनाम लेने का महीना है। इस्लाम के पाँच बुनियादी अरकान बताए गए हैं। कलिमा-ए-तयैबा, नमाज, रोजा, जकाम और हज।

नमाज किसी भी सूरत में (कुछ खास वजह छोड़कर) मुआफ नहीं है। आखिरत में सबसे पहले नमाज का ही हिसाब लिया जाएगा। कुरआन में अल्लाह फरमाता है, जिसका महफूम है कि बेशक नमाज रोकती है, बेहयाई और गुनाह से। नमाज अल्लाह से अपनी जरुरतें पूरी कराने का उससे माँगने का जरिया है। नमाज के मुताल्लिक उलैमा इकराम लिखते हैं कि हर नमाज ऐसे अदा करो गोया यह तुम्हारी आखरी नमाज है।

नमाज वो चीज है जो हर रोज दिन में पाँच बार हमारे ईमान, अखलाक और अहद को मजबूत करती है। फलस्वरूप हम एक बेहतर समाज, कौम और मुल्क ख़ड़ा कर सकें। इंसान और इंसानियत को कायम रख सकें।

नमाज हमारे अकीदों (आस्था) को ताजा करती है जिस पर हमारे नफ्स (शरीर) की पाकीजगी, रूह की तरक्की, अखलाक (चरित्र) की दुरुस्ती और अमल की इस्लाह मौकूफ है। यह उन बेशुमार फायदों में से है जो हमें नमाज से खुदा को नहीं बल्कि हमी को हासिल होते हैं। दरअसल खुदा ने हमारे फायदे के लिए ही इसे हमारे लिए अनिवार्य किया है।

रोजे का मकसद- हर बालिग मुसलमान पर रोजा फर्ज किया गया है। रोजे का मकसद है कि इंसान अपने अंदर तकवा पैदा करे। सिर्फ भूखे प्यासे रहना ही रोजा नहीं है, बल्कि हर बुराई से दूर रहकर अल्लाह और उसके रसूल का जिक्र करना और अपने रिश्तेदार, दोस्त अहबाब से अच्छा सुलूक करना इसका मकसद है।

रोजे की हालत में गैर जरूरी बात अपने मुँह से न निकालें और न ही किसी की गीबत (आलोचना) करें। गीबत करने से रोजा फासिद हो जाता है।
नमाज वो चीज है जो हर रोज दिन में पाँच बार हमारे ईमान, अखलाक और अहद को मजबूत करती है। फलस्वरूप हम एक बेहतर समाज, कौम और मुल्क ख़ड़ा कर सकें। इंसान और इंसानियत को कायम रख सकें।


रोजेदार दिनभर निर्जल-निराहार रहकर उन लोगों की भूख और प्यास काअनुभव करता है जिन्हें दो जून की रोटी भी नसीब नहीं होती। इस प्रकार की अनुभूति रोजेदार के दिल में दया, सहानुभूति और मानवता की भावना जागृत करती है।

खुद अल्लाह ने अपनी किताब कुराने-पाक में फरमाया है कि रोजा तुममें जिम्मेदारी का एहसास करवाता है। यएक तरह से अच्छे कामों के प्रशिक्षण का जरिया है, जो खुदा के आदेश का व्यावहारिक रूप से पालन करने और अनुशासित जीवन जीने के लिए इंसान को प्रशिक्षित करता है और उत्तरदायित्व की भावना को जागृत करता है।

रोजे का मकसद है कि इंसान अल्लाह तआला का शुक्रगुजार और परहेजगार बंदा बने और हैवानियत की गुफा से निकलकर इंसानियत के खुले आसमान पर जलवागर हो। स्पष्ट है रोजा एक पवित्र साधन है, जिसके जरिए आत्मशुद्धि, संयम और सद्कार्यों को करने का प्रशिक्षण और प्रेरणा मिलती है।
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