दिलीप कुमार : एक महानायक की गाथा

पगडंडी से राजमार्ग का सफर

Dilip Kumar
IFM
फिल्म इंडस्ट्री में प्रेम प्रकरणों और सेक्स स्कैंडलों की कभी कोई कमी नहीं रही, लेकिन आजादी के पहले दो-तीन दशकों में, जिसे स्वर्ण युग कहा जाता है, परिस्थितियाँ बहुत भिन्न थीं। मध्यवर्गीय नैतिकता का पालन अनिवार्य था। उस युग के नंबर एक हीरो थे। उनका व्यक्तित्व सलोना था। स्वभाव से वे रोमांटिक थे और कोर्टशिप में माहिर। इस मामले में दिलीप की नफासत को उनकी फिल्मों के प्रणय दृश्यों में देखा जा सकता है। मीना कुमारी और नरगिस से दिलीप के दोस्ताना ताल्लुकात थे। वैजयंतीमाला और वहीदा रहमान के साथ भी फिल्मों में उनकी भागीदारी अच्छी निभी, लेकिन अगर प्रामाणिक दृष्टि से देखा जाए तो दो अभिनेत्रियों से दिलीप कुमार ने सचमुच प्यार किया। वे थीं और मधुबाला। 1948 और 50 के बीच दिलीप-कामिनी ने चार फिल्मों में साथ काम किया था। इनमें 'शहीद' के अलावा अन्य तीन फिल्में 'नदिया के पार', 'शबनम', और 'आरजू' थीं। दर्शकों को इन फिल्मों के प्रणय दृश्य देखकर ही इनके बीच परस्पर प्रेम का अहसास हो जाता था।

तब कामिनी कौशल और दिलीप कुमार दोनों ही फिल्मी करियर की बुनियाद डाल रहे थे। कामिनी कौशल ब्याहता थीं। उनका वास्तविक नाम उमा कश्यप था। वे लाहौर के रायबहादुर डॉ. शिवराम कश्यप की पुत्री थीं और बड़ी बहन की असामयिक मृत्यु के कारण अपनी भ‍तीजियों के भविष्य की खातिर जीजा ब्रह्मस्वरूप सूद से विवाह करके मुंबई आ गई थीं। सूद पोर्ट ट्रस्ट में काम करते थे। उन्होंने कामिनी को फिल्मों में काम करने की आजादी दे रखी थी, लेकिन प्रेम की इजाजत भला कैसे देते। दोनों ने अपने प्रेम को दबाया और वर्षों तक एक-दूसरे के सामने भी नहीं आए।

मधुबाला और दिलीप कुमार के प्यार की दास्तान तो जगजाहिर है। मधुबाला-दिलीप कुमार ने एक साथ सिर्फ चार फिल्में की। इनमें 'मुगल-ए-आजम' (1960) उनकी अंतिम फिल्म है, जिसे लोग इन दोनों की प्रेम कहानी के रूप में ही देखना पसंद करते हैं। मधुबाला भी दिलीप कुमार की तरह भावुक हृदय थीं। उनका मूल नाम मुमताज जहाँ देहलवी था। वे अपने पिता पठान अताउल्लाह की ग्यारह संतानों में से एक थीं और परिवार का गुजारा चलाने के वास्ते फिल्मों में काम करने के लिए मुंबई लाई गई थीं। 1941 में सिर्फ आठ साल की उम्र में उन्होंने फिल्मों में काम शुरू किया था और वे आजाद भारत में नवोदित अभिनेत्री के रूप में उभरीं।

मधुबाला सन् 1951 से 60 के बीच कुल 4 फिल्मों में दिलीप कुमार की नायिका बनीं - तराना, संगदिल, अमर और मुगल-ए-आजम। इनके प्रेम संबंधों के टूटने का कारण भी दिलीप कुमार (और बी.आर. चोपड़ा) की फिल्म 'नया दौर' बनी। मधुबाला ने फिल्म संबंधी विवादों के खत्म होने के बाद भी दिलीप कुमार से सुलह की लंबी प्रतीक्षा की। लेकिन जब 1966 में दिलीप ने सायरा से विवाह कर लिया तो बदले की कार्रवाई करते हुए रजत पट की 'वीनस' ने नायक-गायक किशोर कुमार से शादी कर ली, जो उन दिनों दोनों के बीच संदेशवाहक की भूमिका निभा रहे थे।

'नया दौर' (1957) के निर्माण के समय दिलीप मधुबाला के साथ 'मुगल-ए-आजम' कर रहे थे। मधुबाला के पिता को इनके बीच चल रहे प्यार के चक्कर की भनक लग चुकी थी। दर्शकों को याद होगा कि 'नया दौर' की नायिका वैजयंतीमाला थीं। तथ्य यह भी है कि पहले इस फिल्म के लिए मधुबाला को साइन किया था। चोपड़ा ने जब अताउल्लाह को बताया कि फिल्म की शूटिंग भोपाल के निकट बुधनी में होगी तो वे अड़ गए कि शूटिंग मुंबई में ही होनी चाहिए।

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दोस्ती अलग : प्यार अलग
उनका कहना था कि अपनी बीमार-सी लड़की को शूटिंग के लिए इतनी दूर नहीं भेज सकते। चोपड़ा ने वैजयंतीमाला को साइन कर लिया और मधुबाला के विरुद्ध कोर्ट में मुकदमा कर दिया। इस प्रकरण में न्याय की खातिर दिलीप कुमार चोपड़ा के पक्ष में खड़े रहे। असली अदावत तो दो पठानों के बीच थी। अताउल्लाह और यूसुफ के बीच। अज्ञात मराठी लड़की से लेकर मधुबाला तक तीनों प्रेम प्रकरणों में दिलीप कुमार ने निष्फल प्रेमी की अपनी फिल्मी छवि को साकार रूप दिया। दिलीप कुमार के जीवन में इस तरह के नाटकीय मोड़ आगे भी आते रहे।



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