टीम इंडिया की वर्ल्डकप हार का 'पोस्टमार्टम', विराट और शास्त्री की COA के सामने पेशी

Last Updated: शुक्रवार, 12 जुलाई 2019 (18:08 IST)
लंदन। उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त प्रशासकों की समिति (COA) के सामने कप्तान विराट कोहली और कोच रवि शास्त्री की पेशी होगी, जिसमें आईसीसी क्रिकेट वर्ल्ड कप में टीम इंडिया की का होगा। सीओए को कोहली और शास्त्री को 3 विकेटकीपर के प्लेइंग इलेवन में उतारने से लेकर धोनी को सेमीफाइनल में सातवें नंबर उतारने के जवाब देने होंगे।

विनोद राय की अध्यक्षता वाली समिति प्रमुख चयनकर्ता से भी बात करेगी। समिति में डायना एडुल्जी और लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) रिव थोडगे भी हैं।

राय ने सिंगापुर से प्रेस ट्रस्ट से कहा कि कप्तान और कोच के ब्रेक से लौटने के बाद बैठक जरूर होगी। मैं तारीख और समय नहीं बता सकता लेकिन हम उनसे बात करेंगे। हम चयन समिति से भी बात करेंगे। उन्होंने आगे ब्योरा देने से इंकार कर दिया।
विराट कोहली और टीम रविवार को मुंबई के लिए रवाना होंगे। भारत को सेमीफाइनल में न्यूजीलैंड ने 18 रनों से हराया जबकि ग्रुप चरण में भारतीय टीम शीर्ष पर रही थी। राय ने कहा कि भारत का अभियान अभी खत्म हुआ है। कहां, कब और कैसे जैसे सवालों का मैं आपको कोई जवाब नहीं दे सकूंगा। शास्त्री, कोहली और प्रसाद को कुछ सवालों का जवाब देना पड़ सकता है।
पहला सवाल : मसलन आखिरी श्रृंखला तक अंबाती रायुडू का चयन तय था लेकिन अचानक वे चौथे नंबर की दौड़ से बाहर कैसे हो गए? रायुडू का नाम रिजर्व में भी था लेकिन 2 खिलाड़ियों के चोटिल होने पर भी उन्हें नहीं बुलाया गया जिसके बाद उन्होंने क्रिकेट के सभी प्रारूपों को अलविदा कह दिया।
दूसरा सवाल : टीम में 3 विकेटकीपर क्यों थे खासकर दिनेश कार्तिक की क्या जरूरत थी, जो लंबे समय से फॉर्म में नहीं थे। कार्तिक के अलावा महेंद्र सिंह धोनी और ऋषभ पंत भी टीम में थे।

तीसरा सवाल : सेमीफाइनल में महेंद्र सिंह धोनी को 7वें नंबर पर क्यों उतारा गया? समझा जाता है कि धोनी को नीचे भेजने का फैसला बल्लेबाजी कोच संजय बांगड़ का था। यह भी पूछा जाएगा कि सहायक कोच के इस फैसले का मुख्य कोच ने विरोध क्यों नहीं किया?
मौजूदा चयन समिति बीसीसीआई की आमसभा की बैठक तक बनी रहेगी। ऐसे में प्रसाद को चयन बैठकों में अधिक सक्रिय रहने की सलाह दी जा सकती है।
असल में समस्या प्रसाद से नहीं, बल्कि शरणदीप सिंह और देवांग गांधी से है, क्योंकि कइयों का मानना है कि उनका कुछ योगदान नहीं रहता।

 

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