असफलता जीवन का अंत नहीं है। बल्कि यह वह पहली सीढ़ी है, जहाँ से मंजिल के रास्ते खुलते हैं। फिर ये वो सीख है, जो कहीं और से नहीं मिल सकती है। असफलता एक्सेप्ट कर उससे सीखें, जीवन की प्रायेरिटीज तय करें और कॉन्फिडेंस के साथ आगे बढ़ें, देखें ऐसा कौन-सा दरवाजा है जो खुलता नहीं है।
व्यक्ति अगर यह कहे कि वह जीवन में हमेशा जीतता आया है तो यकीन मानिए वह सरासर झूठ बोल रहा है। कोई भी व्यक्ति सफलता के शिखर पर, हारने के बाद ही पहुँचता है। हार ही उसके मन में जीतने के लिए कोशिश करने का जज्बा पैदा करती है, अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के जुनून को और पुख्ता करती है।
अपनी असफलता को चुनौती के रूप में स्वीकारना, जीत की तरफ ले जाने वाला पहला कदम है। असफल व्यक्ति को कोई प्रोत्साहित नहीं करता, उसे खुद को प्रोत्साहित करना होगा; तभी वह सफल भी हो सकेगा और यह पक्का है ज्यों ही व्यक्ति सफल हुआ दुनिया उसे प्रोत्साहन, पारिश्रमिक, पारितोषिक देने दौड़ पड़ेगी। जरूरत है मैदान में पूरे आत्मविश्वास के साथ डटे रहने की।
आर्या का एक ही सपना था डॉक्टर बनकर नन्हे-मुन्ने बीमार बच्चों को स्वस्थ करने का। बारहवीं तक मेरिट लिस्ट में रहने के बावजूद पीएमटी क्लियर नहीं कर पाई। दो अटेम्प्ट के बाद भी सफलता नहीं मिली मगर सपना नहीं टूटा। स्वास्थ्य सेवा सिर्फ डॉक्टर के जरिए ही दी जाती हो ऐसा तो नहीं है।
चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े तमाम विभागों में आज भी अनगिनत कमियाँ हैं। आर्या ने हिम्मत नहीं हारी और फार्मेसी की प्रवेश परीक्षा में मेरिट सीट हासिल करके प्रतिष्ठित इंस्टिट्यूट से बीफार्मा की डिग्री प्राप्त करके पूरी शिद्दत से आगे की पढ़ाई जारी रखते हुए प्रतिष्ठित फार्मास्युटिकल कंपनी से जुड़ी रही। पीएचडी होते ही वह कंपनी की रिसर्च एंड डेवलपमेंट लैब में भी प्रवेश पाने में सफल हो गई।
भले ही हमें असफलताएँ मिली हों लेकिन इसके बावजूद हमें अपने काम का एक्सपीरिएंस तो हो ही जाता है। इन एक्सपीरिएंसेस के आधार पर शांति से अपने वर्क स्टाइल को स्टडी करें और सफलता पाना ही है, इस सोच के साथ अपने एफर्ट्स जारी रखें क्योंकि जिंदगी चलते रहने का नाम है। कुछ भी हो जाए बट शो मस्ट गो ऑन...